WHAT ARE WONDROUS AYURVEDIC PANCHAKARMA THERAPY?

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WHAT ARE WONDROUS AYURVEDIC PANCHAKARMA THERAPY?

क्या है चमत्कारिक आयुर्वेदिक पंचकर्म चिकित्सा?- डॉ मधु सूदन व्यास

वर्तमान आपाधापी के इस युग में आजीविका उपार्जन प्रमुख आवश्यकता बन गया है। मध्यम आय वर्ग और अभिजात्य वर्ग के व्यक्तियों का आवागमन के साधनो ने, सामान्य पैदल चलना, साइकलिंग, जैसा शारीरिक परिश्रम भी समयाभाव, और दूरस्त स्थान के चलते बंद तो हुआ ही, पर साथ ही व्यायाम, प्रात: या सायं भ्रमण भी बंद कर दिया है। परिणाम स्वरूप रोग प्रतिकार शक्ति (इम्युनिटी पावर) भी समाप्त होती रही हे। वर्तमान दवाओं ने भी नए नए काम्प्लिकेशन पैदा कर दिए हैं। एक रोग मिटता है, दूसरा दस्तक देता है । वर्तमान जीवन चर्या भी जिसमें न तो समय है और न ही धैर्य है, सभी प्राकतिक आचरण नियम पर न चलकर, सब कुछ लाभ तत्काल चाहते हें| मानव जीवन में एसे चमत्कार पूर्ण व्यवस्था आयुर्वेद की इस विधा “पञ्च कर्म चिकित्सा” में है|

आयुर्वेद में कई कठिनता से ठीक होने वाले रोग जिनका कोई अन्य पेथी के पास इलाज नहीं है, के उपचार के लिए परीक्षित और प्रभावी ओषधि और पंचकर्म जैसी चमत्कारिक परिणाम वाली, व्यवस्थाओं का समृद्ध भंडार है। इसमें रोग निवारण के साथ महत्वपूर्ण बात यह भी है, की इससे शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के साथ ही सकारात्मक स्वास्थ्य और, रोगों की रोकथाम करके लाभ लिया जा सकता है|

भारत और विदेश में वैज्ञानिकों और चिकित्सकों आयुर्वेदिक उपचार के इस शास्त्रीय रूप में गहरी रूचि लेकर परख रहे हें उन्हें लगता है जैसे यह कोई चमत्कार है|
आयुर्वेद के इस चमत्कारिक पद्धत्ति पर चलकर देश विदेश में, होटलों में अनेकों “स्पा” केंद्र जैसे खुल गए हैं। होटल, स्वास्थ्य रिसॉर्ट्स, ब्यूटीशियन, क्लीनिक और स्पा केन्द्रों, मालिश केंद्र में एक अलग तरीके का अवैज्ञानिक और व्यावसायिक पंचकर्म लोकप्रिय हो रहा है, इसलिए यह हम आयुर्वेद विज्ञान आधारित पंचकर्म के मानकों को विकसित करना और इसके बारे में जन जागरण करना अधिक आवश्यक हो गया है|

हमारे देश के रेलवे विभाग द्वारा चलती ट्रेनों में भी यह सुविधा देने का निर्णय अभी अभी लिया है, यह आयुर्वेद के लिए ही नहीं मानव जाती के लिए भी सुखद बात है।

आचार्य चरक ने आज से हजारों वर्ष पूर्व इस विधा को अपनाया, अश्वनी कुमारों ने पूर्ण पंचकर्म कर च्यवन ऋषि के जर्जर शरीर का कायाकल्प कर फिर च्यवन प्राश जैसे रसायन सेवन द्वारा सम्पूर्ण नव योवन प्रदान किया था|

शास्त्रीय आयुर्वेदिक पंच कर्म चिकित्सा एक नजर में निम्नानुसार होती है।
इस आयुर्वेदिक उपचार को प्रथम दृष्टि में

(1)- संशोधन चिकित्सा [Purificatory therapy] और

(2)- शमन चिकित्सा [palliative thearpy] इन दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।

यहाँ संशोधन या शुद्धि का विचार [थ्योरी] के द्वारा, कई रोगों का स्थायी इलाज, एवं इम्युनिटी बढाने के लिए किया गया है|

 

दुनिया में कोई भी अन्य चिकित्सा विज्ञान, आयुर्वेद की पंचकर्म चिकित्सा के या इसी तरह के किसी भी सिद्धांत या चिकित्सा जैसा नही है|

इसीलिए आज विश्व इस पंचकर्म पद्ध्ति से चकित है!

अब हम सब पर पंचकर्म के इस प्रभाव को प्रदर्शित करने की चुनोती है। हमारे देश की अधिकतर आयुर्वेद की संस्थायें [75% से अधिक] वास्तविक पंचकर्म के नाम पर केवल स्नेहन और स्वेदन कर रहीं है| इसलिए पंचकर्म चिकित्सा के पूर्ण अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हो पा रहे हैं|

शास्त्रीय पंचकर्म निम्नानुसार है|

जिस प्रकार किसी गंदे कपडे पर रंग नहीं चड़ता, उसे पाहिले साफ़ करना होता है , उसी प्रकार पूर्व कर्म के द्वारा शरीर को शुद्ध बनाया जाता है।

(a) पाचन Pachan ( पाचन क्रिया ठीक करना) हाजमा ठीक नहीं होगा तो सब व्यर्थ है|

(b) स्नेहन Snehan (Oleation theraphy), ओषधिय तेलों या घृत आदि स्नेह (चिकानाई) की विशेष लय में मालिश (साधारण की जाने वाली मालिश नहीं), और स्नेह पान (खिलाना-पिलाना) को स्नेहन कहते है।

(c) स्वेदन Swedan (औषधीय सेंक), ओषधियो की भाप,आदि से स्वेदन अर्थात पसीना की लाकर शारीर के मल (गन्दगी) को निकलते रहने की प्रक्रिया इसके अंतर्गत की जाती है|

(1) वमन कर्म (चिकित्सीय वमन द्वारा चिकित्सा)- विशेष प्रक्रिया द्वारा विशेष द्रव्यों की शयत से निपुण चिकित्सक की देखरेख में वमन (उलटी) कराई जाती है| इसमें व्यक्ति को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता| यह प्रक्रिया इतनी वैज्ञानिक है की वमन(उल्टी) पूर्व निर्धारित संख्या और मात्रा में होती है, रोगों को किसी प्रकार जल की कमी (डीहाईडरेशन) नहीं होता| यह इतनी चमत्कारिक रूप से करवाई जाते है जिससे रोगी तुरंत बाद स्वयं को स्वस्थ और उर्जा-वान निरोगी अनुभव करता है|

(2) विरेचन Virechana कर्मा (चिकित्सीय विरेचन), सामान्य भाषा में इसे दस्त लगाना कुछ लोग समझते हें, परन्तु यह चिकित्सक द्वारा नियंत्रित सटीक होता है की पूर्व निर्धारित बार संख्या, मात्रा और चाहे गए रूप में होता है| इसमें भी रोगी उसी प्रकार से स्वस्थ अनुभव करता है।
(3) वस्ति -निरुह वस्ति Nirooh Vasti (ओषधिय काढ़े/आदि से एनीमा) – यह विशेष प्रकार से विशेष रोग के लिए विशिष्ट ओषधि द्वारा शारीर की गन्दगी को बहार करने की प्रक्रिया है।
(4)अनुवासन वस्ति Anuwasan visti (चिकित्सीय घी तेल, दूध, ओषधि क्वाथ आदि का एनीमा), उपरोक्तानुसार पर कुछ भिन्न इससे शरीर को शक्ति उसी तरह मिलती है जैसे बोटल चडाने या रक्त देने से मिलाती है|

(5) नस्य कर्म (Nasya) (नासिका द्वारा ओषधि देना) नासिका के द्वारा साइनस आदि में सीधे ओषधि तैल, घी, या अन्य ओषधि, पहुंचाने की प्रक्रिया|

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प्रधान कर्म के पश्चात् अर्थात प्रमुख पंचकर्म कार्य के पश्चात किया जाने वाला पोस्ट ओपरेटिव जैसा कार्य है|

(1) संसर्जन कर्म (पश्चात् चिकित्सा आहार आदि द्वारा) – उपरोक्त प्रक्रिया में शरीर शुद्ध हो जाता है, समान्य विकारों से छुटकारा मिल जाता है, उस समय यह संसर्जन कर्म अर्थात शारीर की समस्त प्रक्रियाओं को प्राक्रतिक बनाये रखने का कार्य किया जाता है|

(2) रसायन और वाजीकरण (Rejuvenation या कायाकल्प चिकित्सा), -जैसे च्यवन ऋषि को श्री शुद्धि के बाद च्यवन प्राश रसायन देकर नव योवन दिया गया था, वैसे ही व्यक्ति विशेष की अवश्यकता के अनुसार कायाकल्प [REJUVENATION] का कार्य किया जाता है|

(3) शमन चिकित्सा (Palliative प्रशामक चिकित्सा), शमन के द्वारा व्यक्ति को सामान्य जीवन जीने के लिए तैयार कर दिया जाता है|

 

सम्पूर्ण पंचकर्म का कार्य पूर्ण कायाकल्प के लिए अधिकतम कुल मिलाकर 130 दिन का समय लग सकता है।

पंचकर्म की कोई विशेष प्रक्रिया, रोगों के अनुसार या व्यक्ति की परिस्थिति के अनुसार,  कम से कम 1 दिन से अधिक भी होती है|  विभिन्न प्रक्रिया द्वारा रोग का निवारण और रोग निवारक शक्ति पुनर्जीवित की जा सकती है |
इसी कारण इसे एक चमत्कार के रूप में देखा जा रहा है |

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