“VAMAN – Part of Pancha Karma” “वमन कर्म” [Therepetik Emisis].

“VAMAN – Part of  Pancha Karma” “वमन कर्म” [Therepetik Emisis]

Dr Madhu Sudan Vyas.

वमन, उबकाई, क़ै [vaman, emesis, spew , vomiting,] अर्थात उल्टी होना बड़ी तकलीफ है, और जब भी यह अचानक और अधिक होती है, तो जीवन संकट में पढ़ सकता है|

पर उल्टी अचानक क्यों होती है?

जब भी हमारे शरीर में, मुहं द्वारा कोई एसी चीज प्रवेश कर जाती है, जो शरीर अच्छा नहीं समझता, तो वह उसे बाहर फेंकने लगता है, यह चीज खाने के रूप में खाई हो, अधिक मात्रा में हो, विषेली हो, अरुचिकर हो, या शरीर को उसका पेट, गले आदि स्थान पर रहना अनुचित लग रहा हो, तो मष्तिष्क उसे बाहर फेंकने के लिए संकेत देता है, इससे उबकाई या उत्क्लेश (spew), या उल्टी की इच्छा होने लगती हें, फिर कुछ देर में मुहं से बाहर भी आने लगता है, यही उल्टी, या वमन होती है|

जब तक वह वस्तु पूरी तरह बाहर नहीं फेंक दी जाती तब तक उल्टी आना रुकती नहीं, पर इसमें भी मष्तिष्क को धोखा भी होता है, एक बार उल्टी हो जाने के बाद भी, कभी कभी मष्तिष्क को इस बात का संकेत नहीं मिल पाता की सारी खराबी निकल चुकी हें, इसलिए स्वत: उल्टी होना नहीं रुकता इससे पानी की कमी होकर जीवन संकट खड़ा हो जाता है|

उल्टी हो जाने पर क्यों अच्छा लगने लगता है?

हम सभी ने महसूस किया होगा की कभी कभी गले में कुछ अटकता सा लगता है, उस समय इच्छा होती है, की उसे बाहर निकल दिया जाये, या उलटी कर दी जाये, इस प्रयत्न में हम अंगुली आदि गले में डालकर निकलने की कोशिश करते हें, तो कुछ चिकना सा पदार्थ या पेट का पित्त [कुछ पीला-नीला सा अंश] जिसमें खाना भी हो सकता है, निकलता है| इसके निकलने से हमको राहत मिलती है, यदि खांसी, श्वास, जैसे रोग हों तो इस उल्टी से आराम भी मिल जाता है, इसका अर्थ है, की हमने वमन या उल्टी के द्वारा अटकते हुए ख़राब पदार्थ को निकालकर चिकित्सा कर ली है|

वमन या उल्टी होना भी रोग ठीक होना या चिकित्सा है|

 वास्तव में यह सच भी है, वास्तव में वमन के द्वारा आधी चिकित्सा तो हो ही गई है, शेष आधी के लिए उस अटकने वाले पदार्थ को दोबारा ज़मने से रोका जाये, और शेष जमा हुई खराबी निकल बाहर फेंक दी जाये| यह काम ओषधियों की सहायता से किया जाता है|

पंचकर्म के अंतर्गत होने वाली प्रक्रिया ही “वमन कर्म” [Therepetik Emisis] है|

इसमें केवल कई एसे रोग आते है, जिनमें वमन द्वारा कफ निकालकर रोगी ठीक किया जा सकता है|

जब कई रोगों में, यह निकाले जाने योग्य ख़राब कफ गले अथवा पेट में नहीं होता, तब सामान्य वमन (उल्टी) से निकलता ही नहीं, एसी स्तिथि में भी पंचकर्म की पूर्व-कर्म स्नेहन-स्वेदन आदि के द्वारा उसे पेट गले या उपरी भाग में लाया जाता है, ताकि वहां से वमन द्वारा निकाला जा सके|

वमन की सारी प्रक्रिया कुशल चिकित्सक के आधीन होने से चिकित्सक के पूर्ण नियंत्रण में होती है-

चिकित्सक स्वयं पूर्व से ही निर्धारित कर लेता है, की कितनी बार, कितनी मात्रा के वमन होने से पूरी सफाई हो जाएगी, उसी के अनुसार वामक ओषधि, आदि व्यवस्था दी जाती है, इस प्रकार से शास्त्रोक्त वमन कर्म से पानी की कमी जैसी समस्या न होने से रोगी रोग मुक्त हो जाता है| यदि कुछ दोष शेष रह जाता है तो, विरेचन आदि से निकाल कर रोगी को पूर्ण लाभ दिया जाता है|

कई रोग वमन से आसानी से ठीक हो जाते हें

एसिडिटी, श्वास, कास, प्रमेह, पांडु रोग (एनीमिया), मुख रोग, आदि कई रोगों में वमन कर्म द्वारा रोगी का रोग जड़ से ठीक किया जा सकता है|

पंचकर्म की इस प्रक्रिया वमन के बाद उदर [पेट] के निचले भाग आंत्र आदि की शेष सफाई शास्त्रोक्त विरेचन द्वारा इसी प्रकार नियंत्रित रूप से बिना कोई कष्ट पहुंचाए, निकालकर रोगी को ठीक किया जा सकता है|

अत: समस्त रोगियों के हित में है यह-

यदि कुशल चिकित्सक निर्देशित करता है, तो बिना किसी भय के करवाकर रोग मुक्त होना चाहिए| इस प्रक्रिया में बहुत अधिक व्यय भी नहीं होता| आयुष सेंटर पर इसकी व्यवस्था कुशल निष्णात चिकित्सको के द्वारा की जा रही है|

निर्भय होकर आचार्य चरक द्वारा वर्णित पंचकर्म द्वारा रोग मुक्त होने हेतु इस आयुष सेंटर पर संपर्क करें

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