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Home Remedies for skin problem

चमकती त्वचा के लिए 10 आसान आयुर्वेदिक नुस्खे (Top 10 Ayurvedic Tips For Glowing Skin)

हमें अपनी त्वचा की देखभाल भी प्राकृतिक तरीके (Natual Skin Care) से ही करना चाहिए क्योंकि प्रकृति में ही छिपा है हमारी सुंदरता का राज। बस हमें इसके असर और इस्तेमाल की जानकारी होनी चाहिए। इसमें न तो कोई साइड इफेक्ट का डर है और न ही किसी रिएक्शन का खतरा।

चेहरे और त्वचा का सौन्दर्य, रंगत और कोमलता बढ़ाना चाहते हैं तो हमें प्राकृतिक सौन्दर्य प्रसाधन का इस्तेमाल इसलिए भी करना चाहिए क्योंकि इससे हमारे चेहरे और त्वचा में कुदरती आभा आएगी और यह सुंदरता टिकाऊ भी होगी।

त्वचा को सबसे ज्यादा नुकसान (Harmful Elements for Skin) सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों, धूप, प्रदूषण, तनाव, नींद की कमी, ध्रूमपान और शराब के सेवन से होती है।

बाजार में बिकने वाले महंगे सौंदर्य उत्पाद पर यकीन करने की बजाय अगर हम घरेलू और आयुर्वेदिक नुस्खों (Home based Ayurvedic Remedies) को आजमाएं तो त्वचा में निखार और चमक आने के साथ-साथ त्वचा स्वस्थ भी रहेगी।
ग्लोइंग स्किन 10 आयुर्वेदिक नुस्खे (Ayurvedic Tips for Glowing Skin)

1. हल्दी से हटते हैं मुहांसे

हल्दी एक प्राकृतिक एंटीसेप्टिक एंटी-फंगल है। इसके लेप लगाने से त्वचा पर मुहांसे, पिंपल और पिग्मेंटेशन नहीं होते हैं।

2. चंदन से स्किन में आता ग्लो

बाजार में त्वचा की देखभाल के लिए बिकने बनने वाले ज्यादातर कॉस्मेटिक में चंदन का इस्तेमाल होता है। चंदन से त्वचा में निखार आता है। चंदन त्वचा को ठंडक भी पहुंचाता है। इसके इस्तेमाल से त्वचा पर दाने और मुहांसे नहीं होते हैं।

3. एलोवेरा त्वचा की करती सुरक्षा

एलोवेरा एक नेचुरल एंटी क्लिंजर (Natural Skin Cleanser) है। इससे त्वचा चमकदार बनती है। इसमें पाए जाने वाले एंटी इंफ्लेमटरी गुण से त्वचा की बाहरी परत को सुरक्षा मिलती है। इसके इस्तेमाल से स्किन इंफेक्शन (Skin Infection) होने पर होने वाली जलन भी कम होती है।

4. नीम की पत्ती से त्वचा में आती चमक

त्वचा के लिए नीम की पत्ती काफी कारगर होती है। इससे त्वचा में प्राकृतिक निखार आता है। नीम की पत्ती के पाउडर और पिसी हुई गुलाब की पंखुड़ी को नींबू के रस के साथ मिलाकर लगाने से त्वचा में चमक आती है।

 

6. नींबू से मिटती हैं झुर्रियां

चेहरे पर नींबू का रस लगाएं। निचोड़े गए नींबू के छिलके भी चेहरे पर कुछ दिन तक मल सकते हैं। इससे चेहरे की झुर्रियां मिटेंगी। मुंह धोते समय गालों को हथेलियों से थपथपाकर सुखाएं, इससे गालों में रक्त का संचार बढ़ता है और झुर्रियां मिट जाती हैं।

7. डार्क स्पॉट मिटाने के लिए टमाटर है कारगर

चेहरों का डार्क स्पॉट (Dark Spots) मिटाने में टमाटर काफी असरदार है। टमाटर के रस में नींबू का रस, हल्दी पाउडर और बेसन मिलाकर लेप बना लें। इस लेप को गालों पर लगाएं। सूखने के बाद पानी से चेहरे को धो लें। रोज एक बार इसे आजमाएं। डार्क स्पॉट खत्म हो जाएँगे।

8. चुकंदर चेहरे को बनाएगी गुलाबी

चुकंदर का सेवन त्वचा में गुलाबी निखार लाता है। चुकंदर में काफी मात्रा में आइरन होता है, जिससे हीमोग्लोबिन मिलता है। इसे पीस कर चेहरे पर भी लगा सकते हैं। रोजाना इसे आजमाने से चेहरे पर गुलाबी निखार आता है।

9. अंकुरित चना और मूंग खाएं

अंकुरित चना और मूंग सुबह-शाम खाएं। इससे चेहरे की झुर्रियां खत्म होंगी। चना और मूंग में विटामिन ई होता है, जो झुर्रियां मिटाने में कारगर होता है। चना और मूंग नियमित खाने से स्किन में ग्लो आता है।

10. गाजर का रस पीएं

गाजर में एंटी ऑक्सीडेंट पाया जाता है, एक ग्लास गाजर का रस रोज पिएं। इससे त्वचा में निखार आता है, झुर्रियां गायब होती हैं।

Sciatica Treatment – Dr. Ram Arora.

Sciatica treatment – PARIJAT  leaf and the Blood Disengagement (Rakt-Mokshan) have good results.

गृध्रसी में पारिजात पत्र और रक्त मोक्षण के हें अच्छे परिणामdr arora

Sciatica सायटिका

Pain affecting the back, hip, and outer side of the leg, caused by compression of a spinal nerve root in the lower back, often owing to degeneration of an intervertebral disk. The commonest cause of true sciatica is prolapse of intervertebral discs.- Editor.

चलने का नाम ही जीवन है, परंतु कुछ रोग ऐसे हैं, जिसमें रोगी का चलना फिरना दुर्लभ हो जाता है, और वह दूसरों की तरफ सहायता के लिए दयनीय भाव से देखता रहता है। ऐसा ही एक रोग है ”सायटिका”, जिसमें जब मनुष्य को असहनीय दर्द होता है तो वह ईश्वर से मृत्यु तक की प्रार्थना करता है।

परिचय

इस रोग का अधिक परिचय देने की आवश्यकता नहीं, सामान्यत: सभी इस नाम से परिचित रहते हैं। यह कमर से निकलने वाली सायटिका नाड़ी (नर्व) की सूजन अथवा इस पर किसी प्रकार का दबाव पडऩे से यह दर्द उत्पन्न होता है, जो कि कमर से लेकर पुट्टे (Buttock) से होता हुआ टांग के पिछले हिस्से से पैर के अंगूठे तक जाता है तथा इस दर्द के साथ ही प्राय: रोगी को सुन्नता अथवा सुई चुभने जैसी पीड़ा होती है।

यह दोनों टांगों में हो सकती है, परंतु प्राय: एक ही तरफ के रोगी अधिक मिलते हैं। इस विशेष प्रकार के दर्द के कारण सामान्य व्यक्ति भी कह देता है, कि यह सायटिका का दर्द है। इस दर्द से रोगी को न बैठने से राहत मिलती है, न चलने से और न ही लेटने से आराम मिलता है। इसलिए रोगी बैचेन होकर कभी लेटता है, कभी उठता है, कभी चलता है तो कभी बैठता है, परंतु उसे दर्द से राहत नहीं मिलती तथा फिर इस दर्द के डर से रोगी मानसिक तनाव में आने लगता है, जिससे इस तनाव से दर्द और बढ़ जाता है। इस प्रकार रोगी को दर्द के डर से तनाव और तनाव से फिर दर्द, इस प्रकार दोनों ही बढ़ते चले जाते हैं।

ओषधि के साथ रक्त मोक्षण भी है चिकित्सा

दर्द के इसी डर से रोगी चलते समय एक विशेष प्रकार की चाल से चलने लगता है, जो गिद्ध (गृघ्र) की
चाल जैसी होती है, इसलिए आयुर्वेद में इस रोग को ‘गृघ्रसी’ कहा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार वात दोष के प्रकोपक विभिन्न प्रकार के आहार-विहार के कारण यह रोग होता है। आयुर्वेद के प्राय: सभी ग्रंथों में इसकी विभिन्न प्रकार की चिकित्सा का वर्णन है, जिसमें विभिन्न प्रकार की औषधियों के साथ ही रक्त मोक्षण का भी उल्लेख मिलता है।

पारिजात पत्र क्वाथ से हुआ 80% लाभ  

चक्र दत्त के ग्रंथ में पारिजात (हारसिंगार) पत्र के क्वाथ का वर्णन किया गयाCARS1 है। इसी उल्लेख के आधार पर हमने पारिजात, जिसे शेफालिका या हारसिंगार भी कहते हैं तथा जिसका वैज्ञानिक नाम Nyctanthes arbortristin है, के पत्रों का क्वाथ बना कर १८ रोगियों को एक माह तक प्रयोग करवाया, जिसके परिणाम निम्न रहे-

१. १८ रोगियों में से अधिकांश की आयु ४० वर्ष से कम थी।

२. महिला तथा पुरुषों में यह सामान्य रूप से पाया गया।

३. गरीब वर्ग के व्यक्तियों में यह रोग कुछ अधिक पाया गया।

४. शहर की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र के रोगी कुछ अधिक पाये गये।

५. नौ महिला रोगियों में से सात गृहणियाँ थीं।

६. लगभग ९० (नब्बे) प्रतिशत रोगी हिन्दू पाये गये।

७. रोग के कारण को देखा जाय तो १८ में से ३ रोगियों के गिरने से चोट लगने के बाद, दो रोगियों को भारी वजन उठाने के कारण तथा नौ महिलाओं में से तीन को सामान्य प्रसव के पश्चात भी यह रोग हो गया।

८. एक माह तक पत्तों का क्वाथ पिलाने पर लगभग ८० प्रतिशत रोगियों को विभिन्न लDR Ram Aroraक्षणों में लाभ देखा गया।

रक्त मोक्षण ने दिया प्रभावशाली परिणाम.

इसी प्रकार हमने कई अन्य रोगियों में विभिन्न वात शामक औषधियों के साथ ही रक्त मोक्षण की क्रिया की जो कि शीघ्र प्रभावकारी प्रमाणित हुई। हमने औषधियों के साथ ही कटि वास्ति, नाड़ी स्वेदन, अलावू तथा रक्त मोक्षण आदि प्रक्रियाओं को किया, जिसमें से रक्त मोक्षण की प्रक्रिया से रोगी को शीघ्र परिणाम मिले।

रक्त मोक्षण आयुर्वेद की पंचकर्म चिकित्सा के अंतर्गत होने वाली एक प्रक्रिया है, जो कि जलौंका (लीच), शृंगी, अलावू, घटी यंत्र आदि के द्वारा प्रच्छान्न करके की जाती है। हमने इनका अत्यंत आसान एवं सुलभ परिवर्तित रूप में प्रच्छान कर एक कांच के ग्लास में नकारात्मक दबाव उत्पन्न कर रक्त मोक्षण (खून निकालना) की प्रक्रिया की।

उपरोक्त प्रक्रिया में यदि आप कुछ और जानना चाहे तो सम्पर्क कर सकते हैं।

डॉ. राम अरोरा

एम.डी. (आयुर्वेद) arora.ram15@gmail.com

Photo Clipping

 

Kidney Disease (slide show)

Skin- An insect that is vampire, is the cause for itching or scabies? एक कीट अर्थात पिशाच है, खुजली या स्कैबीज का कारण है?

अधिकतर लोग यह नहीं जानते की मनुष्य ओर पशुओं से पोषण प्राप्त कर जीने वाले, ये भूत प्रेत पिशाच जैसे छोटे छोटे कई परजीवी जिन्हे नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता, शरीर में घुस गए हें। उसकी मादा ने अंडे दिये हें, जो ऊपरी त्वचा के खुजलाने से नाscebij 1
खूनों के माध्यम से शरीर के दूसरे अंगों तक खुजला-खुजला कर पहुचाए जा रहे हें। उन अंडों से निकले परजीवी वयस्क होकर आगे पूरे शरीर में फेल कर अपनी संतानों को बढ़ाते रहते हें। कुछ परजीवी कपड़ों चादरों बिस्तर में गिर कर नए स्थानो की तलाश भी करते रहते हें।

यह एक प्राचीनतम रोग है, यह रोग केवल मनुष्यों में ही नहीं स्तनधारी पशुओं ओर कुत्तों-बिल्लियों में देखा जा सकता है। बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी स्त्री पुरुष इससे प्रभावित हो सकते हें। केवल बाहरी त्वचा(चमड़ी) पर ही नहीं पुरुषो ओर महिलाओं के गुप्तांगों के अंदर बाहर भी रहकर खुजली करते ओर नए स्थान तलाशते रहते हें।

जिस प्रकार लकड़ी को धीरे धीरे घुन scebij 2लगती है उसी प्रकार से शरीर में अति छोटे सुरंग जैसे बिल बना कर ये प्रवेश करते हें, त्वचा के नीचे त्वचा की सबसे बाहरी परत(कोर्नियम) में जाकर मादा अंडे देती है। तीन से 10 दिनों में उनसे लार्वा परिपक्व होकर फिर बच्चे निकालकर फेलते रहते हें। देखें चित्र

त्वचा के बाहर भीतर उनके कारण बने चकत्ते में छुपे दो सप्ताह के जीवन चक्र वाले ये परजीवी, छह पैर वाले लार्वा आठ पैरों के nymphal ओर अंडे अपनी उपस्थित से ओर एलर्जी जैसी प्रतिक्रिया या खुजली पैदा करता है। जो संबन्धित व्यक्ति को खुजलाने पर मजबूर कर देता है, ताकि उसके नाखूनो के सहारे शरीर के अन्य भागों तक पहुँच सकें।

धीरे-धीरे त्वचा के बड़े भाग पर अतिक्रमण कर, पीड़ादायक खुजली (विशेष रूप से रात में) जिससे त्वचा को गंभीर क्षति पैदा करते हें जिससे एक्जिमा भी हो जाता है।

विशेष निदान के लिए परजीवी या उनके अंडे और खोजने के लिए संभावित क्षेत्र से त्वचा खरोचकर, नमूने को माइक्रोस्कोप की मदद से देखे जाता है। या डर्मोस्कोपी की जाती है।

साधारणतयः स्कबीज़ चर्म रोग से मृत्यु हो जाना सुनने में नहीं आता। लेकिन अगर छोटे बच्चों को यह त्वचा रोग हो तो इनमें प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटि) की कमी होने से ओर पस पड़ने से, संक्रमण रक्त में जाने (सैप्टीसीमिया) से बुखार होने पर यह घातक हो सकता है।

चिकित्साscebij 3

इस स्केबीज़ चर्म रोग के इलाज के लिए कुछ ध्यान देने योग्य बातें ये भी हैं, घर में एक भी सदस्य को स्केबीज़ होने पर पूरे परिवार के सभी सदस्यों का एक साथ इलाज होना जरूरी होता है। एक-एक कर चिकित्सा में घर से कीट नष्ट न होकर बार-बार अन्य को संक्रमित करता रहता है। क्योंकि शरीर इनके विरुद्ध एन्टी बॉडी नहीं बनाता।
आयुर्वेद में इन्हे नष्ट करने हेतु महामरिच्यादी तैल गंधक तैल, बड़े प्रभाव शाली है। केवल नीम का तैल लगते रहने से भी रोग ठीक हो जाता है। सारे शरीर की त्वचा [चमड़ी] पर इसे लगाना बहुत ज़रूरी है। अगर मरीज़ इस केवल उन जगहों पर ही लगाएंगे जहां पर ये दाने हैं तो बीमारी का नाश नहीं हो पाएगा। 24 घंटे के अंतराल पर यह दवाई ऐसे ही शरीर पर दो तीन बार लगाई जाती है। रोज एक बार नहा लिया जान जरूरी है। ओषधि का शरीर पर हमेशा [24 घंटे] लगे रहना बहुत ज़रूरी है।
संक्रमण अवस्था में नीम के पत्ते पानी में उबालकर इस पानी से पूरा परिवार रोज नहाये ओर पहनने के वस्त्र, चादर,तकिया गिलाफ, आदि रोज धोये, जो कपड़े रोज न धोये जा सकें तो उन्हे धूप में रखना चाहिए, इससे कीट नष्ट होते हें।
रोग पुन: न हो इसके लिए सबसे अधिक जरूरी है की प्रतिदिन नहाया जरूर जाए। बाहर कहीं से भी आने के बाद, किसी भी संपर्क के बाद, हाथ पैर,धोने की आदत बनाई जाए, नाखून न बडने दिये जाए, ताकि आए कीट फैलने की संभावना न रहे।

यदि रोग अधिक नहीं है तो केवल इतने से ही ठीक हो जाएगा। पर यदि बड़ चुका हे तो खाने की आयुर्वेदिक दवाई भी चिकित्सक की सलाह से लेना चाहिए।
एलोपेथि में भी इस बीमारी के पूर्ण इलाज के लिए दवाईयां उपलब्ध हैं। इन का प्रयोग आप अपने चिकित्सक से मिलने के पश्चात् कर सकते हैं। इस संक्रमण में डाक्टर परमेथ्रिन नामक दवा (स्केबियोल) इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। यह सफेद रंग का एक घोल होता है। जिसे प्रभावित क्षेत्र और गले के नीचे-नीचे शरीर के सभी भागों में लगाया जाता है।

डॉ मधु सूदन व्यास

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