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Spinal or Back Pain- पीठ या कमर का दर्द,

Spinal or Back Pain- रीढ़ की हड्डी में या पीठ, कमर का दर्द,

कभी-कभी वजन उठाते या धकाते समय, अथवा अज्ञात कारणों से कमर या पीठ में दर्द होने लगता है|  इसके अतिरिक्त बडती आयु के साथ साथ भी इस प्रकार का दर्द होने लगता है|

Piles, Arsh or Haemorrhoids – The Ayurvedic Treatment

पाइल्स, बवासीर, या अर्श,  की आयुर्वेदिक चिकित्सा!

शरीर को शत्रु के सामान पीड़ा देने वाले होने से इन्हें अर्श कहते हें| सामान्यत: अर्श या पाइल्स बहुत ज्यादा गंभीर नहीं होते, इस कारण उनकी चिकित्सा पर प्रारंभ में ध्यान नहीं दिया जाता| कब्ज आदि के कारण से हुए तब कब्ज दूर होने पर तीन-चार दिन में अपने आप ही ठीक हो जाते हैं। पर कब्ज की समस्या को दूर न करने से ये बने रहते हें ओर अक्सर रोगी को भी नहीं चलता कि उन्हें पाइल्स हैं। जब अधिक बढ़कर कष्ट देने लगते हें तब उन्हे चिंता होने लगती है|

बवासीर/ अर्श बवासीर या पाइल्स को हीमोरायड्स के नाम से भी जाना जाता है। 

पूर्व उक्त जानकारी में पाइल्स रोग के बारें में जाना की ये क्या हैं? ये कैसे बनते हें? कितनी तरह के होते हें और इनसे कैसे बचा जा सकता है? रोग होने के बाद चिकित्सा आवश्यक होती है जो अर्श के स्तर के अनुसार आयुर्वेदिक चिकित्सा की जाती है|

प्रथम स्तर के पाइल्स या नए पाइल्स में रोगी को पेट साफ करने और खान पान ठीक करने को कहा जाता है। मस्सों पर लगाने की दवाएं दी जाती हैं, केवल इसी से यह रोग मिट जाता है। कब्ज या “constipation” का उपचार करें | कब्ज (कब्ज आदि पेट के रोग? ठीक करने के लिए क्या करें?) आदि के लिए नीचे दी गई दवाओं में से कोई एक किसी चिकित्सक के निर्देशन में ली जा सकती है।

  • उष्ण जल की बस्ती (एनीमा) प्रतिदिन कब्ज के लिए ली जा सकती है|
  • चिकित्सक की सलाह से शोधन बस्ती लाभकारी है|
  • अरंड तेल २५ ग्राम प्रति सप्ताह लेंने से अर्श कष्ट नहीं देते, प्रारम्भिक अवस्था के अर्श केवल इसी से ठीक हो सकते है।
  • कब्ज के लिए, हरड चूर्ण,या पंचसकार चूर्ण एक चम्मच रात को गर्म दूध या गर्म पानी से लें सकते हें|
  • त्रिफला चूर्ण, सत इसबगोल आदि सोते वक्त लिए जा सकते हैं।
  • खाने के बाद अभयारिष्ट/ कुमारी आसव चार-चार चम्मच आधा कप पानी में मिलाकर लें।
  • अर्शोघ्नी वटी की दो गोली सुबह-शाम खाने के बाद पानी से लें।
  • कासिसादी तेल २० ग्राम बस्ती (एनिमा)शोच के बाद दो बार लगाये या पिचु धारण ( रुई (काटन) में भिगो कर शोच के बाद गुदा में रखे) करे, यह तेल अर्श को कटता है अत: चिकित्सक की निगरानी में लेने से अधिक रक्त बहने का खतरा नहीं रहता| अर्श ठीक हो जाने के बाद *इरिमेदादी तेल के बस्ती या पिचु अर्श के घाव को भरने के लिए प्रयोग किया जाता है
  • रक्त को बंद करने बोलबद्ध रस / या बोल पर्पटी/और चन्द्रकला रस का उपयोग किया जा सकता है।
  • दर्द बढ़ जाए तो एक टब गर्म पानी में एक चुटकी फिटकरी या पौटेशियम परमैंग्नेट डालकर सिकाई करें। यह सिकाई हर मल त्याग के बाद करें। पाइल्स कैसे भी हों, अगर सूजन और दर्द है तो गर्म पानी की सिकाई करनी चाहिए।
*[मस्सों पर लगाने के लिए कासिसादी तैल ( मस्से को काटने), जात्यादी तैल ओर इरिमेदादी तैल (घाव भरने) के लिए प्रयोग करते हैं।]

दूसरे ओर तीसरे स्तर के पाइल्स के लिए आयुर्वेदिक क्षारसूत्र चिकित्सा

दूसरे ओर तीसरे स्तर के पाइल्स हैं, तो आयुर्वेद में सबसे ज्यादा प्रभावशाली पद्धति क्षारसूत्र चिकित्सा अपनाई जाती है।

इस तरीके में एक त्रिधारा थूहर ओर हल्दी के योग से बनाया हुआ एक मेडिकेटेड धागे का उपयोग किया जाता है, जिसे क्षारसूत्र कहते हैं। क्षारसूत्र चिकित्सा करने के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सक पहले पाइल्स के मस्सों को प्रोटोस्कोप नाम के यंत्र से देखते हैं, और उसके बाद मस्सों की जड़ में इस धागे को कस कर बंधा जाता है।
मस्सों की जड़ों में एक जगह ऐसी होती है, जहां दर्द नहीं होता। इस जगह पर ही इस क्षारसूत्र को विशेष प्रकार की गांठ द्वारा बांधा जाता है, कि एक दो दिन बाद उसे खोलकर वापिस कसा जा सकें।
मस्सों को अंदर कर दिया जाता है और धागा बाहर की ओर लटकता रहता है। इसे बेंडेज द्वारा स्थिर कर दिया जाता है। इस प्रोसेस में एक से दो हफ्ते का समय लग सकता है।
रोगी को कब्ज न रहे रोज मल ठीक से आए इसके लिए ओषधि देते हें। रोगी क्षार सूत्र बांधा होने पर भी प्रतिदिन मल त्याग कर सकता है।
इस दौरान इस धागे के जरिये दवाएं धीरे धीरे मस्से को काटतीं हें ओर उनको सुखाकर गिरा देती हैं। मस्से गिरने के साथ ही धागा भी अपने आप गिर जाता है। इसमें दर्द नहीं होता।
इस दौरान चिकित्सक रोगी का आकलन करते रहते हें कि सारी प्रक्रिया ठीक चल रही है, और कितना फायदा हो रहा है।
कभी कभी यदि क्षार सूत्र निकाल जाए या उसकी ओषधि निकाल जाए तो दूसरा सूत्र बढ़ दिया जाता है।
इस दौरान मरीज को कुछ दवाओं का सेवन करने के लिए कहा जाता है और ऐसी चीजें ज्यादा खाने की सलाह दी जाती है, जो कब्ज दूर करने में सहायक हों। गर्म पानी की सिकाई और कुछ व्यायाम भी बताए जाते हैं।
क्षारसूत्र चिकित्सा के लिए अस्पताल में भर्ती होने की भी अधिक जरूरत नहीं होती। यदि रोगी कि स्थिति ठीक है तो उसेको घर भेजा जा सकता है।
कुछ चिकित्सक इस प्रक्रिया को लोकल एनैस्थिसिया के तहत करते हें, ओर प्रतिदिन गांठ कसते हें, इससे अर्श जल्दी निकाल जाता है। पर रोज कसने से कदाचित दर्द हो सकता है।
इस तरीके से इलाज के बाद पाइल्स के दोबारा होने की आशंका खत्म हो जाती है।
क्षार सूत्र द्वारा भगंदर या फिश्चूला की चिकित्सा भी की जाती है, इसमें भगंदर के दोनों छिद्रों से सूत्र निकाल कर एक गठान बाँध दी जाती है, आवश्यकता के अनुसार इसके कसने से बीच का भाग कटता जाता है और पीछे का धीरे धीरे घाव भरता भी जाता है, इस प्रकार कुछ ही दिन में भगदर की नाडी या केनाल नष्ट हो जाने से भगंदर भी ठीक हो जाता है|

उज्जैन में माह जनवरी १६ से एक आयुर्वेद चिकित्सा केंद्र का शुभारम्भ किया  जा रहा है जहाँ उज्जैन सहित देश के कई आयुर्वेद विषय के विशेषज्ञों की सेवा किसी निर्द्धारित दिन विशेष केम्पों में और ओंन लाइन विडिओ कोंफ्रेंसिग से मिल सकेंगी साथ ही केंद्र पर पंचकर्म क्षार सूत्र आदि चिकित्सा सामान्य शुल्क पर उपलब्ध होगी|
कई शहरों में कुछ क्वेक्स चिकित्सक विशेषकर बंगाली डॉक्टर “बिना चीरे फाड़े बबासीर का इलाज” का बोर्ड लगाकर इसीप्रकार से चिकित्सा करते हें परन्तु अवैज्ञानिक और अन हायजिनिक होने से उनसे यह कार्य न करवाकर क्वालिफाइड आयुर्वेदिक चिकित्सा विशेषग्य से यह कार्य (क्षार -सूत्र) करवाना उचित है, अन्यथा व्यापद (कॉम्लिकेशन) होने की  संभावना होती है।
समय समय पर निशुल्क केम्प लगाकर चिकित्सा और चिकित्सकों को निशुल्क प्रशिक्षित भी किया जाता रहता है| इसके लिए आप यदि पंजीकृत चिकित्सक हैं तो केम्प में शामिल हो सकते हें|

-Dr Madhu Sudan vyas

WHAT ARE WONDROUS AYURVEDIC PANCHAKARMA THERAPY?

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WHAT ARE WONDROUS AYURVEDIC PANCHAKARMA THERAPY?

क्या है चमत्कारिक आयुर्वेदिक पंचकर्म चिकित्सा?- डॉ मधु सूदन व्यास

वर्तमान आपाधापी के इस युग में आजीविका उपार्जन प्रमुख आवश्यकता बन गया है। मध्यम आय वर्ग और अभिजात्य वर्ग के व्यक्तियों का आवागमन के साधनो ने, सामान्य पैदल चलना, साइकलिंग, जैसा शारीरिक परिश्रम भी समयाभाव, और दूरस्त स्थान के चलते बंद तो हुआ ही, पर साथ ही व्यायाम, प्रात: या सायं भ्रमण भी बंद कर दिया है। परिणाम स्वरूप रोग प्रतिकार शक्ति (इम्युनिटी पावर) भी समाप्त होती रही हे। वर्तमान दवाओं ने भी नए नए काम्प्लिकेशन पैदा कर दिए हैं। एक रोग मिटता है, दूसरा दस्तक देता है । वर्तमान जीवन चर्या भी जिसमें न तो समय है और न ही धैर्य है, सभी प्राकतिक आचरण नियम पर न चलकर, सब कुछ लाभ तत्काल चाहते हें| मानव जीवन में एसे चमत्कार पूर्ण व्यवस्था आयुर्वेद की इस विधा “पञ्च कर्म चिकित्सा” में है|

आयुर्वेद में कई कठिनता से ठीक होने वाले रोग जिनका कोई अन्य पेथी के पास इलाज नहीं है, के उपचार के लिए परीक्षित और प्रभावी ओषधि और पंचकर्म जैसी चमत्कारिक परिणाम वाली, व्यवस्थाओं का समृद्ध भंडार है। इसमें रोग निवारण के साथ महत्वपूर्ण बात यह भी है, की इससे शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के साथ ही सकारात्मक स्वास्थ्य और, रोगों की रोकथाम करके लाभ लिया जा सकता है|

भारत और विदेश में वैज्ञानिकों और चिकित्सकों आयुर्वेदिक उपचार के इस शास्त्रीय रूप में गहरी रूचि लेकर परख रहे हें उन्हें लगता है जैसे यह कोई चमत्कार है|
आयुर्वेद के इस चमत्कारिक पद्धत्ति पर चलकर देश विदेश में, होटलों में अनेकों “स्पा” केंद्र जैसे खुल गए हैं। होटल, स्वास्थ्य रिसॉर्ट्स, ब्यूटीशियन, क्लीनिक और स्पा केन्द्रों, मालिश केंद्र में एक अलग तरीके का अवैज्ञानिक और व्यावसायिक पंचकर्म लोकप्रिय हो रहा है, इसलिए यह हम आयुर्वेद विज्ञान आधारित पंचकर्म के मानकों को विकसित करना और इसके बारे में जन जागरण करना अधिक आवश्यक हो गया है|

हमारे देश के रेलवे विभाग द्वारा चलती ट्रेनों में भी यह सुविधा देने का निर्णय अभी अभी लिया है, यह आयुर्वेद के लिए ही नहीं मानव जाती के लिए भी सुखद बात है।

आचार्य चरक ने आज से हजारों वर्ष पूर्व इस विधा को अपनाया, अश्वनी कुमारों ने पूर्ण पंचकर्म कर च्यवन ऋषि के जर्जर शरीर का कायाकल्प कर फिर च्यवन प्राश जैसे रसायन सेवन द्वारा सम्पूर्ण नव योवन प्रदान किया था|

शास्त्रीय आयुर्वेदिक पंच कर्म चिकित्सा एक नजर में निम्नानुसार होती है।
इस आयुर्वेदिक उपचार को प्रथम दृष्टि में

(1)- संशोधन चिकित्सा [Purificatory therapy] और

(2)- शमन चिकित्सा [palliative thearpy] इन दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।

यहाँ संशोधन या शुद्धि का विचार [थ्योरी] के द्वारा, कई रोगों का स्थायी इलाज, एवं इम्युनिटी बढाने के लिए किया गया है|

 

दुनिया में कोई भी अन्य चिकित्सा विज्ञान, आयुर्वेद की पंचकर्म चिकित्सा के या इसी तरह के किसी भी सिद्धांत या चिकित्सा जैसा नही है|

इसीलिए आज विश्व इस पंचकर्म पद्ध्ति से चकित है!

अब हम सब पर पंचकर्म के इस प्रभाव को प्रदर्शित करने की चुनोती है। हमारे देश की अधिकतर आयुर्वेद की संस्थायें [75% से अधिक] वास्तविक पंचकर्म के नाम पर केवल स्नेहन और स्वेदन कर रहीं है| इसलिए पंचकर्म चिकित्सा के पूर्ण अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हो पा रहे हैं|

शास्त्रीय पंचकर्म निम्नानुसार है|

जिस प्रकार किसी गंदे कपडे पर रंग नहीं चड़ता, उसे पाहिले साफ़ करना होता है , उसी प्रकार पूर्व कर्म के द्वारा शरीर को शुद्ध बनाया जाता है।

(a) पाचन Pachan ( पाचन क्रिया ठीक करना) हाजमा ठीक नहीं होगा तो सब व्यर्थ है|

(b) स्नेहन Snehan (Oleation theraphy), ओषधिय तेलों या घृत आदि स्नेह (चिकानाई) की विशेष लय में मालिश (साधारण की जाने वाली मालिश नहीं), और स्नेह पान (खिलाना-पिलाना) को स्नेहन कहते है।

(c) स्वेदन Swedan (औषधीय सेंक), ओषधियो की भाप,आदि से स्वेदन अर्थात पसीना की लाकर शारीर के मल (गन्दगी) को निकलते रहने की प्रक्रिया इसके अंतर्गत की जाती है|

(1) वमन कर्म (चिकित्सीय वमन द्वारा चिकित्सा)- विशेष प्रक्रिया द्वारा विशेष द्रव्यों की शयत से निपुण चिकित्सक की देखरेख में वमन (उलटी) कराई जाती है| इसमें व्यक्ति को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता| यह प्रक्रिया इतनी वैज्ञानिक है की वमन(उल्टी) पूर्व निर्धारित संख्या और मात्रा में होती है, रोगों को किसी प्रकार जल की कमी (डीहाईडरेशन) नहीं होता| यह इतनी चमत्कारिक रूप से करवाई जाते है जिससे रोगी तुरंत बाद स्वयं को स्वस्थ और उर्जा-वान निरोगी अनुभव करता है|

(2) विरेचन Virechana कर्मा (चिकित्सीय विरेचन), सामान्य भाषा में इसे दस्त लगाना कुछ लोग समझते हें, परन्तु यह चिकित्सक द्वारा नियंत्रित सटीक होता है की पूर्व निर्धारित बार संख्या, मात्रा और चाहे गए रूप में होता है| इसमें भी रोगी उसी प्रकार से स्वस्थ अनुभव करता है।
(3) वस्ति -निरुह वस्ति Nirooh Vasti (ओषधिय काढ़े/आदि से एनीमा) – यह विशेष प्रकार से विशेष रोग के लिए विशिष्ट ओषधि द्वारा शारीर की गन्दगी को बहार करने की प्रक्रिया है।
(4)अनुवासन वस्ति Anuwasan visti (चिकित्सीय घी तेल, दूध, ओषधि क्वाथ आदि का एनीमा), उपरोक्तानुसार पर कुछ भिन्न इससे शरीर को शक्ति उसी तरह मिलती है जैसे बोटल चडाने या रक्त देने से मिलाती है|

(5) नस्य कर्म (Nasya) (नासिका द्वारा ओषधि देना) नासिका के द्वारा साइनस आदि में सीधे ओषधि तैल, घी, या अन्य ओषधि, पहुंचाने की प्रक्रिया|

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प्रधान कर्म के पश्चात् अर्थात प्रमुख पंचकर्म कार्य के पश्चात किया जाने वाला पोस्ट ओपरेटिव जैसा कार्य है|

(1) संसर्जन कर्म (पश्चात् चिकित्सा आहार आदि द्वारा) – उपरोक्त प्रक्रिया में शरीर शुद्ध हो जाता है, समान्य विकारों से छुटकारा मिल जाता है, उस समय यह संसर्जन कर्म अर्थात शारीर की समस्त प्रक्रियाओं को प्राक्रतिक बनाये रखने का कार्य किया जाता है|

(2) रसायन और वाजीकरण (Rejuvenation या कायाकल्प चिकित्सा), -जैसे च्यवन ऋषि को श्री शुद्धि के बाद च्यवन प्राश रसायन देकर नव योवन दिया गया था, वैसे ही व्यक्ति विशेष की अवश्यकता के अनुसार कायाकल्प [REJUVENATION] का कार्य किया जाता है|

(3) शमन चिकित्सा (Palliative प्रशामक चिकित्सा), शमन के द्वारा व्यक्ति को सामान्य जीवन जीने के लिए तैयार कर दिया जाता है|

 

सम्पूर्ण पंचकर्म का कार्य पूर्ण कायाकल्प के लिए अधिकतम कुल मिलाकर 130 दिन का समय लग सकता है।

पंचकर्म की कोई विशेष प्रक्रिया, रोगों के अनुसार या व्यक्ति की परिस्थिति के अनुसार,  कम से कम 1 दिन से अधिक भी होती है|  विभिन्न प्रक्रिया द्वारा रोग का निवारण और रोग निवारक शक्ति पुनर्जीवित की जा सकती है |
इसी कारण इसे एक चमत्कार के रूप में देखा जा रहा है |

Panchakarma can be Rejuvenating ?

प्रश्न- क्या पंचकर्म से कायाकल्प हो सकता है ?

उत्तर- जी हाँ, आज की एक व्यस्त तनावपूर्ण और विषाक्त वातावरण में हमारे शरीर और मन में शारीरिक निष्क्रियता के कारण विषाक्त पदार्थों को जमा होते रहते हें| इससे स्वास्थ्य को हानी पहुचाने वाले विशेष गंभीर रोग उतपन्न होने लगते हें| पंचकर्म से शरीर पर हुए इन दुष्प्रभावों को नष्ट कर पुन: स्वस्थ्य शरीर पाने में मदद मिलती है| इस परिवर्तन से जीवन में नई उमंग और उत्साह उत्पन्न होता है| यही काया कल्प है|

Q-What are wondrous Ayurvedic Panchakarma therapy?

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Q- क्या है चमत्कारिक आयुर्वेदिक पंचकर्म चिकित्सा?
डॉ मधु सूदन व्यास

कायाकल्प, या REJUVENATION कर सकने वाली आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धत्ति पंचकर्म आज विश्वभर में एक चमत्कारिक थेरेपी के रूप में देखा जा रहा है,, प्रश्न उठता है की आखिर क्या है यह पंचकर्म चिकित्सा?

वर्तमान आपाधापी के इस युग में आजीविका उपार्जन प्रमुख आवश्यकता बन गया है। मध्यम आय वर्ग और अभिजात्य वर्ग के व्यक्तियों का आवागमन के साधनो ने, सामान्य पैदल चलना, साइकलिंग, जैसा शारीरिक परिश्रम भी समयाभाव, और दूरस्त स्थान के चलते बंद तो हुआ ही, पर साथ ही व्यायाम, प्रात: या सायं भ्रमण भी बंद कर दिया है। परिणाम स्वरूप रोग प्रतिकार शक्ति (इम्युनिटी पावर) भी समाप्त होती रही हे। वर्तमान दवाओं ने भी नए नए काम्प्लिकेशन पैदा कर दिए हैं। एक रोग मिटता है, दूसरा दस्तक देता है । वर्तमान जीवन चर्या भी जिसमें न तो समय है और न ही धैर्य है, सभी प्राकतिक आचरण नियम पर न चलकर, सब कुछ लाभ तत्काल चाहते हें| मानव जीवन में एसे चमत्कार पूर्ण व्यवस्था आयुर्वेद की इस विधा “पञ्च कर्म चिकित्सा” में है|

आयुर्वेद में कई कठिनता से ठीक होने वाले रोग जिनका कोई अन्य पेथी के पास इलाज नहीं है, के उपचार के लिए परीक्षित और प्रभावी ओषधि और व्यवस्थाओं का समृद्ध भंडार है। इसमें रोग निवारण के साथ महत्वपूर्ण बात यह भी है, की इससे शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के साथ ही सकारात्मक स्वास्थ्य और, रोगों की रोकथाम करके लाभ लिया जा सकता है|

भारत और विदेश में वैज्ञानिकों और चिकित्सकों आयुर्वेदिक उपचार के इस शास्त्रीय रूप में गहरी रूचि लेकर परख रहे हें उन्हें लगता है जैसे यह कोई चमत्कार है|
आयुर्वेद के इस चमत्कारिक पद्धत्ति पर चलकर देश विदेश में, होटलों में अनेकों “स्पा” केंद्र जैसे खुल गए हैं। हमारे देश के रेलवे विभाग द्वारा चलती ट्रेनों में भी यह सुविधा देने का निर्णय अभी अभी लिया है, यह आयुर्वेद के लिए ही नहीं मानव जाती के लिए भी सुखद बात है।

क्या है यह चमत्कार कर रही पंचकर्म चिकित्सा?

आचार्य चरक ने आज से हजारों वर्ष पूर्व इस विधा को अपनाया, अश्वनी कुमारों ने इसी के मध्यम से च्यवन ऋषि के जर्जर शरीर को संशोधित कर फिर रसायन सेवन द्वारा च्यवन प्राश द्वारा कायाकल्प किया था|

शास्त्रीय आयुर्वेदिक पंच कर्म चिकित्सा एक नजर में निम्नानुसार होती है।
इस आयुर्वेदिक उपचार को प्रथम दृष्टि में (1)- संशोधन चिकित्सा [Purificatory therapy] और (2)- शमन चिकित्सा [palliative thearpy] इन दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।
यहाँ संशोधन या शुद्धि का विचार [थ्योरी] के द्वारा, कई रोगों का स्थायी इलाज, एवं इम्युनिटी बढाने के लिए किया गया है| दुनिया में कोई भी अन्य चिकित्सा विज्ञान, आयुर्वेद की पंचकर्म चिकित्सा के या इसी तरह के किसी भी सिद्धांत या चिकित्सा जैसा नही है|
आज विश्व इस पंचकर्म पद्ध्ति से चकित है, अब हम सब पर पंचकर्म के इस प्रभाव को प्रदर्शित करने की चुनोती है। हमारे देश की अधिकतर आयुर्वेद की संस्थायें [75% से अधिक] वास्तविक पंचकर्म के नम्म पर केवल स्नेहन और स्वेदन कर रहीं है| इसलिए पंचकर्म चिकित्सा के पूर्ण अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हो पा रहे हैं|

होटल, स्वास्थ्य रिसॉर्ट्स, ब्यूटीशियन, क्लीनिक और स्पा केन्द्रों, मालिश केंद्र में एक अलग तरीके का पंचकर्म लोकप्रिय हो रहा है, इसलिए यह हम आयुर्वेद विज्ञान आधारित पंचकर्म के मानकों को विकसित करना और इसके बारे में जन जागरण करना अधिक आवश्यक हो गया है|
देश में आने वाले पर्यटक कुछ विशेष रोग से या थकान आदि विशेष लक्षणों से ग्रस्त होते हें, पंचकर्म प्रक्रियाओं के द्वारा लाभ और रहत दी जा सकती है|

इसी तरह हम स्वास्थ्य को ठीक करने के लिए पंचकर्म चिकित्सा पद्धत्ति को जोड़कर चिकित्सा पर्यटन को बढावा भी दे सकते हें| भारतीय रेलवे का इसी दृष्टि से परिकल्पना की जा रही है|

शास्त्रीय पंचकर्म निम्नानुसार है|

[1] पूर्व कर्म (मख्य पंचकर्म कार्य की पूर्व कार्य) जिस प्रकार किसी गंदे कपडे पर रंग नहीं चड़ता, उसे पाहिले साफ़ करना होता है , उसी प्रकार पूर्व कर्म के द्वारा श्री को शुद्ध बनाया जाता है।

(a) पाचन Pachan ( पाचन क्रिया ठीक करना) हाजमा ठीक नहीं होगा तो सब व्यर्थ है|

(b) स्नेहन Snehan (Oleation theraphy), ओषधिय तेलों या घृत आदि स्नेह (चिकानाई) की विशेष लय में मालिश (साधारण की जाने वाली मालिश नहीं), और स्नेह पान (खिलाना-पिलाना) को स्नेहन कहते है।

(c) स्वेदन Swedan (औषधीय सेंक), ओषधियो की भाप,आदि से स्वेदन अर्थात पसीना की लाकर शारीर के मल (गन्दगी) को निकलते रहने की प्रक्रिया इसके अंतर्गत की जाती है|

[2] प्रधान कर्म (मुख्य प्रक्रिया)

(1) वमन कर्म (चिकित्सीय वमन द्वारा चिकित्सा)- विशेष प्रक्रिया द्वारा विशेष द्रव्यों की शयत से निपुण चिकित्सक की देखरेख में वमन (उलटी) कराई जाती है| इसमें व्यक्ति को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता| यह प्रक्रिया इतनी वैज्ञानिक है की वमन(उल्टी) पूर्व निर्धारित संख्या और मात्रा में होती है, रोगों को किसी प्रकार जल की कमी (डीहाईडरेशन) नहीं होता| यह इतनी चमत्कारिक रूप से करवाई जाते है जिससे रोगी तुरंत बाद स्वयं को स्वस्थ और उर्जा-वान निरोगी अनुभव करता है|

(2) विरेचन Virechana कर्मा (चिकित्सीय विरेचन), सामान्य भाषा में इसे दस्त लगाना कुछ लोग समझते हें, परन्तु यह चिकित्सक द्वारा नियंत्रित सटीक होता है की पूर्व निर्धारित बार संख्या, मात्रा और चाहे गए रूप में होता है| इसमें भी रोगी उसी प्रकार से स्वस्थ अनुभव करता है।
(3) वस्ति -निरुह वस्ति Nirooh Vasti (ओषधिय काढ़े/आदि से एनीमा) – यह विशेष प्रकार से विशेष रोग के लिए विशिष्ट ओषधि द्वारा शारीर की गन्दगी को बहार करने की प्रक्रिया है।
(4)अनुवासन वस्ति Anuwasan visti (चिकित्सीय घी तेल, दूध, ओषधि क्वाथ आदि का एनीमा), उपरोक्तानुसार पर कुछ भिन्न इससे शरीर को शक्ति उसी तरह मिलती है जैसे बोटल चडाने या रक्त देने से मिलाती है|

(5) नस्य कर्म (Nasya) (नासिका द्वारा ओषधि देना) नासिका के द्वारा साइनस आदि में सीधे ओषधि तैल, घी, या अन्य ओषधि, पहुंचाने की प्रक्रिया|

[3] पश्चात् कर्म (प्रधान कर्म के पश्चात् उपचारात्मक उपाय) जैसा की नाम से पता चलता है प्रमुख पंचकर्म के पश्चात किया जाने वाला पोस्ट ओपरेटिव जैसा कार्य है|

(1) संसर्जन कर्म (पश्चात् चिकित्सा आहार आदि द्वारा) – उपरोक्त प्रक्रिया में शरीर शुद्ध हो जाता है, समान्य विकारों से छुटकारा मिल जाता है, उस समय यह संसर्जन कर्म अर्थात शारीर की समस्त प्रक्रियाओं को प्राक्रतिक बनाये रखने का कार्य किया जाता है|

(2) रसायन और वाजीकरण (Rejuvenation या कायाकल्प चिकित्सा), -जैसे च्यवन ऋषि को श्री शुद्धि के बाद च्यवन प्राश रसायन देकर नव योवन दिया गया था, वैसे ही व्यक्ति विशेष की अवश्यकता के अनुसार कायाकल्प [REJUVENATION] का कार्य किया जाता है|

(3) शमन चिकित्सा (Palliative प्रशामक चिकित्सा), शमन के द्वारा व्यक्ति को सामान्य जीवन जीने के लिए तैयार कर दिया जाता है|

इस प्रकार से सम्पूर्ण पंचकर्म का कार्य संपन्न होता है| इस कायाकल्प में अधिकतम कुल मिलाकर 130 दिन का समय लग सकता है।

रोगों के अनुसार या व्यक्ति की परिस्थिति अनुसार कम से कम 1 दिन या अधिक दिन में विभिन्न प्रक्रिया द्वारा रोग निवारण और रोग निवारक शक्ति पुनर्जीवित की जा सकती है |
इसी कारण इसे एक चमत्कार के रूप में देखा जा रहा है |

 

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