Spinal or Back Pain- पीठ या कमर का दर्द,

Spinal or Back Pain- रीढ़ की हड्डी में या पीठ, कमर का दर्द,

कभी-कभी वजन उठाते या धकाते समय, अथवा अज्ञात कारणों से कमर या पीठ में दर्द होने लगता है|  इसके अतिरिक्त बडती आयु के साथ साथ भी इस प्रकार का दर्द होने लगता है|

हमारे रीड की हड्डियाँ एक बांस की संरचना के समान होती हें, यह भाग कमर से उपरी सारे शरीर का वजन उठाती है| इस बीच के जोड़ से जुड़े भाग को ‘न्यूक्लियस’ डिस्क कहा जाता है। इसमें जेली जैसा पदार्थ भर होता है, इसे डिस्क जेल कहते हें| यह झटकों से बचाने का काम करता है । इस हेतु इसमें छल्लेदार और रेशेदार परतें ( annulus or “ring”) होती हें।Desktop55

अचानक लगने वाले अथवा अधिक दवाव के कारण, या आयु बड़ने से डिस्क जेल (पानी) कम होने से,  होकर बाहर की ओर खिसक जाता है। ओर एक प्रकार का उभार सा बन जाता है, ओर रिंग फेल सी जाती है, यह वेसा ही है, जेसे किसी फटी हुए थेली से पोटली सी निकलने लगे। इसके अत्यधिक दबाब के कारण परतों में टूटन होने लगती है।
इससे वलय के बाहर तरल जेली (नाभिक pulposus) का रिसाव होने लगता है। परिणाम के रूप में चोट लगने जैसा होता है, इससे दो डिस्क (कशेरुका) को जो अब तक आसानी से बंधे हुए थे, में अस्थिरता पैदा होती है, हमात्र मष्तिष्क इसे जलन, और गंभीर पीठ दर्द (nerve irritation can lead to severe back pain.) जो नीचे पेरों तक चला जाता है के रूप में महसूस करता है| यह दर्द पीठ के निचले हिस्से तक महसूस किया जा सकता है, या, यह पैर नीचे radiates रीड की हड्डी के बीच मेरु नाड़ी मे भी हो सकता है।  

 “म्हारो चौर्लो चलोई गिओ” जैसे शब्द कहते हुए यहाँ हमारे पास अक्सर रोगी आते हें|  इसे डिस्क की हर्नियेशन (डिस्क खिसकना या उतरना) या आम जन भाषा में “चोरला चला जाना” कहा जाता है| आयुर्वेद की भाषा में इसे वात प्रकोप या संचरण कहा जाता है|

कमर या मेरुनाडीय दर्द, साधारणत:  चोट लगने, वजन उठाने या कमर मुड़ने से होती है| इसे उस स्थान पर तेज दर्द के साथ महसूस तो की ही जाती है साथ ही अंदरूनी भागों में जलन जैसी प्रतिक्रिया या कभी कभी आंत्र-रोग, या मूत्राशय रोग के रूप भी हो प्रकट हो सकती है। इस दर्द में कटिस्नायुशूल या ग्रध्रसी (Sciatica) जैसी स्तिथि भी, पैर में (आमतौर पर पैर या टखने के भाग में) या पेर की पिंडली वाले भाग में नीचे की ओर चलती हुई सी जलन या तेज दर्द के साथ महसूस की जाती है| साथ ही अक्सर स्तब्ध (dazed) हो जाना आदि जेसे लक्षण हो सकते है।

आधुनिक चिकित्सक इसकी चिकित्सा एक मात्र सर्जरी मानते हें, पर सर्जरी से बाहर निकले पदार्थ को अंदर धकेला जा सकता है, पुन: बहार आने से रोक भी लगाई जा सकती है, पर सूखे हुए तरल को पुनः स्थापित किया जाना संभव नहीं होता| एलोपेथिक चिकित्सक व्यर्थ एम् आर आई , एक्स रे करवा कर पैन किलर, ट्रेक्शन, और फिजियो थेरेपी आदि, मात्र चिकित्सा देते हें|

आयुर्वेदिक पंचकर्म चिकित्सा द्वारा यह संभव हो सकता है।

पंचकर्म में की जाने वाली प्रक्रियाओं जैसे कटिबस्ती, पत्रपिंड स्वेद, आदि द्वारा रोगी को लाभ दिया जा सकता है। आयुर्वेदिक चिकित्सक इसकी चिकित्सा करते समय मल-मूत्र की स्थिति पर नजर रखते हुए भोजन अनुपान, ओर कई प्रकार की ओषधि बस्तियो (एनीमास) का प्रयोग करते हें। कटी बस्ती के द्वारा सूखे तरल को पुनर्स्थापित भी आसानी से किया जाता है| इन समस्त या आवश्यकता के अनुसार की गई क्रियाओं से बाहर आया पदार्थ न केवल अन्दर चला जाता है बल्कि  जेल पुन: स्थापित हो सकती है|

आयुर्वेद में विशिष्ट फिजिओथेरेपी भी पंचकर्म के साथ ही जुड़ी होती है। पूरी चिकित्सा लंबे समय तक चलती रह सकती है। इसके लिए किसो  कुशल पंचकर्म विशेषज्ञ की सहायता लेना चाहिए।

नई या अचानक दवाव, मुड़ने आदि से होने वाली समस्या को, विषगर्भ, नारायण, या मुर्छित तिल तेल के स्नेहन पश्चात्,  निर्गुन्डी पत्र या रास्नादी वात शामक द्रव्यों के क्वाथ के नाडी स्वेद, के साथ अरंड तैल रेचन, और महारास्नादी क्वाथ के साथ योगराज या महायोगराज गूगल और शिलाजितु या चन्द्र प्रभावटी रसायन, सेवन से  एक सप्ताह में ठीक किया जा सकता है| हमारा अनुभव है की एक दिन की ही उपरोक्त चिकित्सा से रोगी आराम दिखने लगता है|

 -डॉ मधु सूदन व्यास

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