Fisher-problem


क्या होता है फिशर?

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आम तौर पर गुदा से सम्बंधित सभी रोगों को बवासीर या पाईल्स ही समझ लिया जाता है, लेकीन इसमें कई और रोग भी हो सकते है |जिन्हें हम पाईल्स समझते है | ऐसा ही एक रोग है फिशर | इसे आयुर्वेद में गुदचीर या परिकार्तिका भी कहते है | इस रोग में गुदा के आसपास के क्षेत्र में एक चीरे या क्रैक जैसी स्थिति बन जाती है , जिसे फिशर कहते है |


फिशर के लक्षण

फिशर से पीडि़त रोगी को टॉयलेट जाते समय गुदा द्वार बहुत अधिक दर्द होता है, यह दर्द ऐसा होता है जैसे किसी ने काट दिया हो, और यह दर्द काफी देर तक (2-4 घंटों) बना रहता है। कभी कभी तो पूरे दिन ही रोगी दर्द से परेशान रहता है। इस रोग के बढ़ जाने पर रोगी को बैठना भी मुश्किल हो जाता है। दर्द के कारण इससे पीडि़त रोगी टॉयलेट जाने से डरने लगता है। कभी कभी गुदा में बहुत अधिक जलन होती है, जो कि कई बार तो टॉयलेट जाने के 4-5 घंटे तक बनी रहती है। गुदा में कभी कभी खुजली भी रहती है।
फिशर के 1 साल से अधिक पुराना होने पर गुदा के ऊपर या नीचे या दोनों तरफ सूजन या उभार सा बन जाता है, जो एक मस्से या जैसे खाल लटक जाती है, ऐसा महसूस होता है। इसे बादी बवासीर या सेंटीनेल टैग कहते हैं।
टॉयलेट के समय खून कभी कभी बहुत थोडा सा आता है या आता ही नहीं है। यह खून सख्त मल (लेट्रीन) पर लकीर की तरह या कभी कभी बूंदों के रूप में हो सकता है।
किसे होती है फिशर होने की अधिक संभावना?
फिशर की बीमारी स्त्री, पुरुष, बच्चों, वृद्ध, या युवा किसी भी ऐसे व्यक्ति को हो सकती है, जिसे कब्ज़ रहती हो या मल कठिनाई से निकलता हो। ज़्यादातर निम्न लोगों को ये बीमारी होने की संभावना अधिक होती है –
ऐसे लोग जिन्हें बाजार का जंक फूड जैसे पिज्जा, बर्गर, नॉन वेज, अत्यधिक मिर्च-मसाले वाला भोजन खाने का शौक होता है जो पानी कम पीते हैं जो ज़्यादातर समय बैठे रहते हैं और किसी भी प्रकार का शारीरिक श्रम नहीं करते महिलाओं मे गर्भावस्था के समय कब्ज़ हो जाती है जिससे, फिशर या पाईल्स हो सकते हैं। फिशर सामान्यत: भी महिलाओं में पुरुषों की अपेक्षा अधिक होता है।


कैसे बचा जा सकता है फिशर से?

चूंकि फिशर होने का मूल कारण कब्ज़ व मल का सख्त होना होता है। अत: इससे बचने के लिए हमें भोजन संबंधी आदतों में ऐसे कुछ बदलाव करने होंगे जिससे पेट साफ रहे व कब्ज़ ना हो। जैसे –
भोजन में फलों का सेवन
सलाद व सब्जियों का प्रचुर मात्रा में नियमित सेवन। करना पानी और द्रवों का अधिक मात्रा में सेवन करना। हल्के व्यायाम, शारीरिक श्रम, मॉर्निंग वॉक आदि का करना। छाछ और दही का नियमित सेवन करना। अत्यधिक मिर्च, मसाले, जंक फूड, मांसाहार का परहेज करना।

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