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Heel pain- How can rescue? एड़ी दर्द – कैसे हो मुक्ति?

एड़ी दर्द जो करता है, लाचार- कैसे हो मुक्ति?  –  डॉ मधु सूदन व्यास -9425379102 .

 प्लँनटर फँसिइटिस   – पैरो के तलवो पर आयी एक दर्दनाक सूजन है, तलवों में एक तंतुमय ऊतको का जाल होता है, जो पैरो के तलवो को मोडने में मदद करता है| इसमें भारीपन और आवश्यकता से अधिक खिंचाव हो, तब  उसके टिशूज में तरल द्रव्य (लिक्विड) एकत्र होता है| विशेषकर जहाँ  एड़ी की हड्डी से मिलती है| सामान्यत प्लँनटर फँसिइटिस किसी को भी हो सकता है, परन्तु मधुमेह से ग्रसित लोग, मोटे लोगों, गर्भवती महिलाओं, धावक, वॉलीबॉल खिलाड़ी, टेनिस खिलाड़ियों और जो एरोबिक्स या सीढ़ी चढ़ने में भाग लेते हैं, को अधिक पाया जाता है| इसके अलावा आपको तलवे का  फँसिइटिस भी  हो सकता है, एसा अधिकतर एक बड़े उपकरण या फर्नीचर को घिसे हुवे या खराब जूते पहिनकर  खिसकाते हैं। एथलीटों में, पदतल फँसिइटिस गहन प्रशिक्षण की अवधि में हो सकता है, विशेष रूप से धावकों में जो अचानक तेजी से दूर स्थान तक दौडना शुरु करते है। सपाट पैर के साथ लोगों में पदतल फँसिइटिस के होने की  जोखिम होती है।

एड़ी में गांठ – एक एड़ी गांठ एक की हड्डी कि असामान्य वृद्धि है, यह पैर के तलवे और हड्डी के मिलने के स्थान पर होती है| यह पदतल के चर्म पर और पैर की मांसपेशियों पर लंबे समय तक तनाव के कारण, विशेष रूप से मोटे लोगों में, धावक या कसरत के लिये दौडने वाले में होती है। पदतल फँसिइटिस में जहाँ घिसे हुवे, खराब फिटिंग या खराब गुणवत्ता निर्माण के जूते पहननेसे समस्या बढ़ सकती है। एड़ी में दर्द का कारण एड़ी में गांठ भी होता है, यह  एक्सरे पर भी देख सकते हैं। वास्तव में, ये पदतल फँसिइटिस का ही एक परिणाम हो सकता है|

केल्केनियल अपोफिसीटीस Calcaneal apophysitis – इस हालत में, एड़ी की हड्डी के बीच के क्षेत्र तकलीफ होती है, जो  नए जूते पहनने के परिणाम स्वरूप या एथलेटिक गतिविधियों में आयी वृद्धि से होती है। यह दर्द एड़ी के निचले क्षेत्र के बजाय पीछे की तरफ होता है। 8 और 14 की उम्र के बीच के बढ़ती उम्र के सक्रिय बच्चों में यह एड़ी में दर्द का एक काफी आम कारण रहा है। हालांकि लगभग कोई भी लड़के या लड़की इससे प्रभावित हो सकते है, जो बच्चें खेल में हिस्सा लेते है, जिसमें बहुत कूदने की आवश्यकता होती है, उनमें इस स्थिति के विकास का सबसे ज्यादा खतरा है।

Bursitis – bursitis –  हड्डी के जोड़ों के बीच एक चिकनाहट की पर्त होती है जो कई जोडो को ढकती है और जब संयुक्त जोड़ों की गतिविधी होती है, तब स्नायु और मांसपेशियों को आसानी से स्थानांतरित करने के लिए मदद करती है। इसकी कमी इस दर्द  कारण हो सकती है|

पंप जूतो से सुजन – इस हालत को चिकित्सकीय भाषा में एडी के पीछे की calcaneal exostosis रूप में जाना जाता है, यह एड़ी के पीछे  एक असामान्य हड्डी की वृधि  है। यह विशेष रूप से युवा महिलाओं में आम है, और अक्सर लंबे समय तक bursitis होने  से संबंधित है, जो की पंप जूते ( एक तरह के हल्के जूते) के दबाव के कारण होता है।

स्थानीय खरोंच/ चोट  पैर के अन्य भागों की तरह एड़ी को भी अचानक खरोंच या आघात हो सकता है। विशिष्ठ रुप से एक तेज वस्तु से पैर को चोट  होने से , नंगे पाँव घूमने से पत्थर से लग सकती है|

Achilles tendonitis – ज्यादातर मामलों में, Achilles tendonitis एडीयो से अत्याधिक काम लेने से वह नाजुक हो जाती हैं, यह एडी के स्नायु की सूजन के रूप में होती है| विशेष रूप से खेल के दौरान अत्यधिक कूदने से ये समस्या शुरु होती है। हालांकि, यह खराब फिटिंग के जूते पहनने से भी हो जाती है| अगर एक जूते का पिछला ऊपरी भाग  अधिक कसा हुआ हो, तो यह उस एड़ी में उत्पन्न हो सकती है|

 पदतल Fasciitis –  अधिकांश डॉक्टरों एक छह से आठ सप्ताह का आराम करने की सलाह देते है, इनमें शामिल है, खेल से अस्थायी समय के लिये आराम जिससे पैर की समस्या शुरु हुई है, पैरो के तलवो को खिंचाव व्यायाम, बर्फ से मालिश, जूतो में संशोधन या बदलाव, घायल पैर के तलवो को टेप लगाना, और acetaminophen (Tylenol) या स्टँराँइड के बिना दवाईयाँ, सुजन विरोधी दवा (NSAIDs) एस्पिरिन या ibuprofen जैसे, (एडविल, Motrin और अन्य) दर्द से राहत के लिए। यदि इस इलाज से आराम नहीं मिलता है,  दर्द क्षेत्र में corticosteroid दवा का इंजेक्शन भी  दिया जाता है पर यह देना शरीर के लिए अत्यंत हानि कारक है| सर्जरी शायद ही कभी आवश्यक होती है, और वह भी हमेशा सफल नहीं रहती। जबकि आधुनिक चिकित्सा में एड़ी में गांठ  के लिए सर्जरी एक अंतिम उपाय है।

Calcaneal apophysitis   यह स्थिति आमतौर पर अपने आप ही ठीक  हो जाती है।  आयुर्वेदिक उपचार  में आराम और एड़ी के लिये पैड और एड़ी तकिये का उपयोग करना चाहिए|

 Bursitis –  इस समस्या का इलाज  एड़ी में गांठ के उपचार के समान है।  जूते के प्रकार बदलना आवश्यक हो सकता है। .

 लगभग सभी प्रकार के एडी की तकलीफ आयुर्वेदिक उपचार पंचकर्म के स्नेहन स्वेदन से ही ठीक की जा सकती है, विशेष परिस्थितियों में ही वमनादी संशोधन जरुरी होता है| इसमें औषधीय तेलों से स्नेहन स्थानीय स्नेहन कर निर्गुन्डी अर्क, आदि पत्र, और उड़द आदि से बनाये पिंड द्वारा स्वेदन से ही लाभ हो जाता है| कुछ परिस्थितियों में रक्त मोक्षण का भी अधिक प्रभाव मिलता है| परन्तु यह सब यह निपुण चिकित्सक की देख रेख में ही होना चहिये|
 चिकित्सा संसार द्वारा प्रारम्भ किये गए, उज्जैन स्थित “आयुष पंचकर्म एवं चिकित्सा संस्थान 125 कंठाल उज्जैन – फोन- 9425092492 पर इसकी चिकित्सा एवं चिकित्सको को प्रशिक्षण उपलब्ध है| संपर्क डॉ मधु सूदन व्यास – 9425379102 .

Benefits of VIRECHNA- A Part of Pancha Karma, [Therepetik Purgation विरेचन]

Benefits of VIRECHNA- A Part of  Pancha Karma, [Therepetik Purgation विरेचन]

डॉ मधु सूदन व्यास

हमारा पेट ही है प्रत्येक रोग का प्रारम्भिक स्थान?

हम जीवित रहने के लिए खाते हें, खाना मनुष्य की स्वभाविक वृत्ति है| जन्मते ही एक सामान्य मनुष्यसबसे पहिले वह यही सीखता है, और जीवन पर्यंत कुछ न कुछ खाता-पीता ही रहता है, और अक्सर इतना की उसे अच्छे-बुरे में भेद भी नहीं करता [सात्विक विशेष व्यक्तियों को छोड़कर] , इस तरह कि मनुष्य पाचन संस्थान किसी अजायबघर की तरह भी माना जा सकता है|

“VAMAN – Part of Pancha Karma” “वमन कर्म” [Therepetik Emisis].

“VAMAN – Part of  Pancha Karma” “वमन कर्म” [Therepetik Emisis]

Dr Madhu Sudan Vyas.

वमन, उबकाई, क़ै [vaman, emesis, spew , vomiting,] अर्थात उल्टी होना बड़ी तकलीफ है, और जब भी यह अचानक और अधिक होती है, तो जीवन संकट में पढ़ सकता है|

पर उल्टी अचानक क्यों होती है?

जब भी हमारे शरीर में, मुहं द्वारा कोई एसी चीज प्रवेश कर जाती है, जो शरीर अच्छा नहीं समझता, तो वह उसे बाहर फेंकने लगता है, यह चीज खाने के रूप में खाई हो, अधिक मात्रा में हो, विषेली हो, अरुचिकर हो, या शरीर को उसका पेट, गले आदि स्थान पर रहना अनुचित लग रहा हो, तो मष्तिष्क उसे बाहर फेंकने के लिए संकेत देता है, इससे उबकाई या उत्क्लेश (spew), या उल्टी की इच्छा होने लगती हें, फिर कुछ देर में मुहं से बाहर भी आने लगता है, यही उल्टी, या वमन होती है|

जब तक वह वस्तु पूरी तरह बाहर नहीं फेंक दी जाती तब तक उल्टी आना रुकती नहीं, पर इसमें भी मष्तिष्क को धोखा भी होता है, एक बार उल्टी हो जाने के बाद भी, कभी कभी मष्तिष्क को इस बात का संकेत नहीं मिल पाता की सारी खराबी निकल चुकी हें, इसलिए स्वत: उल्टी होना नहीं रुकता इससे पानी की कमी होकर जीवन संकट खड़ा हो जाता है|

उल्टी हो जाने पर क्यों अच्छा लगने लगता है?

हम सभी ने महसूस किया होगा की कभी कभी गले में कुछ अटकता सा लगता है, उस समय इच्छा होती है, की उसे बाहर निकल दिया जाये, या उलटी कर दी जाये, इस प्रयत्न में हम अंगुली आदि गले में डालकर निकलने की कोशिश करते हें, तो कुछ चिकना सा पदार्थ या पेट का पित्त [कुछ पीला-नीला सा अंश] जिसमें खाना भी हो सकता है, निकलता है| इसके निकलने से हमको राहत मिलती है, यदि खांसी, श्वास, जैसे रोग हों तो इस उल्टी से आराम भी मिल जाता है, इसका अर्थ है, की हमने वमन या उल्टी के द्वारा अटकते हुए ख़राब पदार्थ को निकालकर चिकित्सा कर ली है|

वमन या उल्टी होना भी रोग ठीक होना या चिकित्सा है|

 वास्तव में यह सच भी है, वास्तव में वमन के द्वारा आधी चिकित्सा तो हो ही गई है, शेष आधी के लिए उस अटकने वाले पदार्थ को दोबारा ज़मने से रोका जाये, और शेष जमा हुई खराबी निकल बाहर फेंक दी जाये| यह काम ओषधियों की सहायता से किया जाता है|

पंचकर्म के अंतर्गत होने वाली प्रक्रिया ही “वमन कर्म” [Therepetik Emisis] है|

इसमें केवल कई एसे रोग आते है, जिनमें वमन द्वारा कफ निकालकर रोगी ठीक किया जा सकता है|

जब कई रोगों में, यह निकाले जाने योग्य ख़राब कफ गले अथवा पेट में नहीं होता, तब सामान्य वमन (उल्टी) से निकलता ही नहीं, एसी स्तिथि में भी पंचकर्म की पूर्व-कर्म स्नेहन-स्वेदन आदि के द्वारा उसे पेट गले या उपरी भाग में लाया जाता है, ताकि वहां से वमन द्वारा निकाला जा सके|

वमन की सारी प्रक्रिया कुशल चिकित्सक के आधीन होने से चिकित्सक के पूर्ण नियंत्रण में होती है-

चिकित्सक स्वयं पूर्व से ही निर्धारित कर लेता है, की कितनी बार, कितनी मात्रा के वमन होने से पूरी सफाई हो जाएगी, उसी के अनुसार वामक ओषधि, आदि व्यवस्था दी जाती है, इस प्रकार से शास्त्रोक्त वमन कर्म से पानी की कमी जैसी समस्या न होने से रोगी रोग मुक्त हो जाता है| यदि कुछ दोष शेष रह जाता है तो, विरेचन आदि से निकाल कर रोगी को पूर्ण लाभ दिया जाता है|

कई रोग वमन से आसानी से ठीक हो जाते हें

एसिडिटी, श्वास, कास, प्रमेह, पांडु रोग (एनीमिया), मुख रोग, आदि कई रोगों में वमन कर्म द्वारा रोगी का रोग जड़ से ठीक किया जा सकता है|

पंचकर्म की इस प्रक्रिया वमन के बाद उदर [पेट] के निचले भाग आंत्र आदि की शेष सफाई शास्त्रोक्त विरेचन द्वारा इसी प्रकार नियंत्रित रूप से बिना कोई कष्ट पहुंचाए, निकालकर रोगी को ठीक किया जा सकता है|

अत: समस्त रोगियों के हित में है यह-

यदि कुशल चिकित्सक निर्देशित करता है, तो बिना किसी भय के करवाकर रोग मुक्त होना चाहिए| इस प्रक्रिया में बहुत अधिक व्यय भी नहीं होता| आयुष सेंटर पर इसकी व्यवस्था कुशल निष्णात चिकित्सको के द्वारा की जा रही है|

निर्भय होकर आचार्य चरक द्वारा वर्णित पंचकर्म द्वारा रोग मुक्त होने हेतु इस आयुष सेंटर पर संपर्क करें

Blood Disengagement is a natural healing.(रक्त मोक्षण है, प्राकृतिक चिकित्सा.)

Blood disengagement is a natural healing.

रक्त मोक्षण है प्राकृतिक चिकित्सा|

अल्टरनेटिव चिकित्सा पद्धतियों में माना जाता है, की रक्त मोक्षण से ख़राब रक्त निकल जाने से लाभ होता है पर यह बात आधुनिक विचार से गले नहीं उतरती, और इन प्रक्रियाओं पर प्रश्न चिन्ह लगता है|

Elimination of harmful bacteria may be transmitted by Panchakarma.

पंचकर्म द्वरा हानिकारक बेक्टीरिया नष्ट किये जा सकते हें|

अमेरिका के होवार्ड विश्वविध्यालय में हुए एक अध्ययन में 73% व्यक्तियों के वजन न घटने का कारण एक हानिकारक बेक्टीरिया को माना गया है|

Joint pain in the winter season,ठंड में जोड़ों का दर्द,

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 ठंड में जोड़ों का दर्द

एक भाई ने प्रश्न किया है की जब भी ठण्ड पड़ती है, उनके जोड़ों खास कर घुटनों में दर्द होता है| हड्डी के डाक्टर को दिखया तो उनने कहा घुटना बदलना पड़ेगा| कुछ दवाई दी, जब तक दवा चली आराम तब तक ही रहा क्या करूँ?

यह समस्या आजकल आम पाई जा रही है|

होता यह है की ठंड के मौसम में रक्‍तवाहिनियां सिकुड़ जाती हैं, जिससे रक्त का तापमान कम होने से प्रवाह कम होने लगता है, शरीर का नियंत्रक ह्रदय को अधिक रक्त पहुचाने लगता है, ताकि वहां अधिक उष्णता और सक्रियता बनी रहे, इस कारन शरीर के अन्य अंगों में रक्त कम मिलता है, जिन जिन अंगों में रक्त कम मिलता है वहां वहां दर्द महसूस होना शुरू हो जाता है| इसी क्रम में शरीर के सभी जोड़ भी सिकुडने लगते हैं, इसी सुकुडने के कारण दर्द महसूस होता है| चूँकि शरीर का पूरा भार घुटनों पर होता है, इसीलिए घुटनों के जोड़ का दर्द अधिक प्रभावित करता है|

What’s Parlaisis?

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What’s Parlaisis? क्या है लकवा या पेरलाइसिस?

हमारे शरीर की समस्त हलचल या गति विधियाँ मांसपेशियों के द्वारा की जाती हें पर इन सभी मांसपेशियों को मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित किया जाता हे| मस्तिष्क यह कार्य तंत्रिका तंत्र या नर्वस सिस्टम जो की एक विधुत के तारों की तरह सारे शरीर में फेला रहता है, के द्वारा सन्देश भेज कर सम्पादित करता है|  दुसरे शब्दों में हम कहें तो शरीर की सारी गतिविधियों के सञ्चालन की जिम्मेदारी मस्तिष्क पर होती हे या शरीर के सभी भागों से संदेश प्रक्रियाओं के नियंत्रण मस्तिष्क के अधीन है| कभी कभी तंत्रिका कोशिकाओं, या मस्तिष्क के न्यूरॉन्स, की मांसपेशियों को नियंत्रित नहीं कर पाती| तब वह मांसपेशियों को स्वेच्छा से नियंत्रण करने की क्षमता खो देता है, इससे व्यक्ति अपनी समस्त क्षमताएं खो देता है, यही लकवा या पेरलाइसिस होता है|

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