Monthly Archives: December 2015

Food habits Of kids (Child).

Q&A

From: Nitya <pihunitya@gmail.com>
Q-  How to improve Kids food habits. kids are generally fuzzy about healthy food. And sometimes even normal food… Can we increase there appetite and cultivate good food habits.

उत्तर- यह कई माता-पिता की शिकायत है की उनके बच्चे स्वास्थ्य कर खाना पसंद नहीं

What’s Parlaisis?

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What’s Parlaisis? क्या है लकवा या पेरलाइसिस?

हमारे शरीर की समस्त हलचल या गति विधियाँ मांसपेशियों के द्वारा की जाती हें पर इन सभी मांसपेशियों को मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित किया जाता हे| मस्तिष्क यह कार्य तंत्रिका तंत्र या नर्वस सिस्टम जो की एक विधुत के तारों की तरह सारे शरीर में फेला रहता है, के द्वारा सन्देश भेज कर सम्पादित करता है|  दुसरे शब्दों में हम कहें तो शरीर की सारी गतिविधियों के सञ्चालन की जिम्मेदारी मस्तिष्क पर होती हे या शरीर के सभी भागों से संदेश प्रक्रियाओं के नियंत्रण मस्तिष्क के अधीन है| कभी कभी तंत्रिका कोशिकाओं, या मस्तिष्क के न्यूरॉन्स, की मांसपेशियों को नियंत्रित नहीं कर पाती| तब वह मांसपेशियों को स्वेच्छा से नियंत्रण करने की क्षमता खो देता है, इससे व्यक्ति अपनी समस्त क्षमताएं खो देता है, यही लकवा या पेरलाइसिस होता है|

Spinal or Back Pain- पीठ या कमर का दर्द,

Spinal or Back Pain- रीढ़ की हड्डी में या पीठ, कमर का दर्द,

कभी-कभी वजन उठाते या धकाते समय, अथवा अज्ञात कारणों से कमर या पीठ में दर्द होने लगता है|  इसके अतिरिक्त बडती आयु के साथ साथ भी इस प्रकार का दर्द होने लगता है|

“How recognising Diabetes? डायबीटीज या मधुमेह को कैसे पहिचाने?”

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डायबीटीज या मधुमेह को कैसे पहिचाने?

डॉ मधुसूदन व्यास.
डायबीटीज आज एक आम रोग के रूप में दिखाई देता है, अब सब जानते हें की यह वर्तमान परिस्थितियों की देन है। परंतु पिछले कुछ समय से जब शिशुओं में भी यह पाया गया तो स्थिति बड़ी ही भयावह नजर आने लगी है। पर अकसर इस रोग का प्रारम्भ में पता नहीं चल पाता। इसका कारण कुछ भय वश कुछ अनजाने में समय रहते अर्थात लगभग 40 के आसपास सतर्क नहीं होते ओर जांच से बचते हें, यदि समय रहते जांच हो जाए तो नियंत्रण कर अधिक हानी से बचा जा सकता है।
हमारे इस लेख का उद्धेश्य भी यही है की सब जान लें, डाईविटीज से बचने के बारे में हम कई बहुत बार जान चुके हें, पर इसके अन्य पहलुओं के बारे में सब तब तक नहीं जानते जब तक यह रोग उन्हे घेर नहीं लेता।

Ear- May be, Yourself responsible for hearing?,कम सुनने के लिए कहीं स्वयं तो जिम्मेदार नहीं?


कम सुनने के लिए कहीं स्वयं तो जिम्मेदार नहीं?

कान भी हमारा एक सच्चा साथी होता है, मृत्युपर्यंत यह स्वस्थ रहे इस हेतु इसे भी अनावश्यक छेड़ना नहीं चाहिए। हमेशा कान में में कुछ न कुछ डालते रहने की आदत हानिकारक होती है। यदि कान में खुजली आदि चलती है, तो इसका कारण सुखापन होता है। यदि कान में कोई संकर्मण /पस या किसी प्रकार का पानी आदि नहीं आता हो तो निरंतर तैल डालते रहना चाहिए। जिस प्रकार नमी की बाहरी त्वचा को जरूरत होती हे उसी प्रकार कान के अंदर की नली को भी नमी की जरूरत होती है।

Skin- An insect that is vampire, is the cause for itching or scabies? एक कीट अर्थात पिशाच है, खुजली या स्कैबीज का कारण है?

अधिकतर लोग यह नहीं जानते की मनुष्य ओर पशुओं से पोषण प्राप्त कर जीने वाले, ये भूत प्रेत पिशाच जैसे छोटे छोटे कई परजीवी जिन्हे नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता, शरीर में घुस गए हें। उसकी मादा ने अंडे दिये हें, जो ऊपरी त्वचा के खुजलाने से नाscebij 1
खूनों के माध्यम से शरीर के दूसरे अंगों तक खुजला-खुजला कर पहुचाए जा रहे हें। उन अंडों से निकले परजीवी वयस्क होकर आगे पूरे शरीर में फेल कर अपनी संतानों को बढ़ाते रहते हें। कुछ परजीवी कपड़ों चादरों बिस्तर में गिर कर नए स्थानो की तलाश भी करते रहते हें।

यह एक प्राचीनतम रोग है, यह रोग केवल मनुष्यों में ही नहीं स्तनधारी पशुओं ओर कुत्तों-बिल्लियों में देखा जा सकता है। बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी स्त्री पुरुष इससे प्रभावित हो सकते हें। केवल बाहरी त्वचा(चमड़ी) पर ही नहीं पुरुषो ओर महिलाओं के गुप्तांगों के अंदर बाहर भी रहकर खुजली करते ओर नए स्थान तलाशते रहते हें।

जिस प्रकार लकड़ी को धीरे धीरे घुन scebij 2लगती है उसी प्रकार से शरीर में अति छोटे सुरंग जैसे बिल बना कर ये प्रवेश करते हें, त्वचा के नीचे त्वचा की सबसे बाहरी परत(कोर्नियम) में जाकर मादा अंडे देती है। तीन से 10 दिनों में उनसे लार्वा परिपक्व होकर फिर बच्चे निकालकर फेलते रहते हें। देखें चित्र

त्वचा के बाहर भीतर उनके कारण बने चकत्ते में छुपे दो सप्ताह के जीवन चक्र वाले ये परजीवी, छह पैर वाले लार्वा आठ पैरों के nymphal ओर अंडे अपनी उपस्थित से ओर एलर्जी जैसी प्रतिक्रिया या खुजली पैदा करता है। जो संबन्धित व्यक्ति को खुजलाने पर मजबूर कर देता है, ताकि उसके नाखूनो के सहारे शरीर के अन्य भागों तक पहुँच सकें।

धीरे-धीरे त्वचा के बड़े भाग पर अतिक्रमण कर, पीड़ादायक खुजली (विशेष रूप से रात में) जिससे त्वचा को गंभीर क्षति पैदा करते हें जिससे एक्जिमा भी हो जाता है।

विशेष निदान के लिए परजीवी या उनके अंडे और खोजने के लिए संभावित क्षेत्र से त्वचा खरोचकर, नमूने को माइक्रोस्कोप की मदद से देखे जाता है। या डर्मोस्कोपी की जाती है।

साधारणतयः स्कबीज़ चर्म रोग से मृत्यु हो जाना सुनने में नहीं आता। लेकिन अगर छोटे बच्चों को यह त्वचा रोग हो तो इनमें प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटि) की कमी होने से ओर पस पड़ने से, संक्रमण रक्त में जाने (सैप्टीसीमिया) से बुखार होने पर यह घातक हो सकता है।

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इस स्केबीज़ चर्म रोग के इलाज के लिए कुछ ध्यान देने योग्य बातें ये भी हैं, घर में एक भी सदस्य को स्केबीज़ होने पर पूरे परिवार के सभी सदस्यों का एक साथ इलाज होना जरूरी होता है। एक-एक कर चिकित्सा में घर से कीट नष्ट न होकर बार-बार अन्य को संक्रमित करता रहता है। क्योंकि शरीर इनके विरुद्ध एन्टी बॉडी नहीं बनाता।
आयुर्वेद में इन्हे नष्ट करने हेतु महामरिच्यादी तैल गंधक तैल, बड़े प्रभाव शाली है। केवल नीम का तैल लगते रहने से भी रोग ठीक हो जाता है। सारे शरीर की त्वचा [चमड़ी] पर इसे लगाना बहुत ज़रूरी है। अगर मरीज़ इस केवल उन जगहों पर ही लगाएंगे जहां पर ये दाने हैं तो बीमारी का नाश नहीं हो पाएगा। 24 घंटे के अंतराल पर यह दवाई ऐसे ही शरीर पर दो तीन बार लगाई जाती है। रोज एक बार नहा लिया जान जरूरी है। ओषधि का शरीर पर हमेशा [24 घंटे] लगे रहना बहुत ज़रूरी है।
संक्रमण अवस्था में नीम के पत्ते पानी में उबालकर इस पानी से पूरा परिवार रोज नहाये ओर पहनने के वस्त्र, चादर,तकिया गिलाफ, आदि रोज धोये, जो कपड़े रोज न धोये जा सकें तो उन्हे धूप में रखना चाहिए, इससे कीट नष्ट होते हें।
रोग पुन: न हो इसके लिए सबसे अधिक जरूरी है की प्रतिदिन नहाया जरूर जाए। बाहर कहीं से भी आने के बाद, किसी भी संपर्क के बाद, हाथ पैर,धोने की आदत बनाई जाए, नाखून न बडने दिये जाए, ताकि आए कीट फैलने की संभावना न रहे।

यदि रोग अधिक नहीं है तो केवल इतने से ही ठीक हो जाएगा। पर यदि बड़ चुका हे तो खाने की आयुर्वेदिक दवाई भी चिकित्सक की सलाह से लेना चाहिए।
एलोपेथि में भी इस बीमारी के पूर्ण इलाज के लिए दवाईयां उपलब्ध हैं। इन का प्रयोग आप अपने चिकित्सक से मिलने के पश्चात् कर सकते हैं। इस संक्रमण में डाक्टर परमेथ्रिन नामक दवा (स्केबियोल) इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। यह सफेद रंग का एक घोल होता है। जिसे प्रभावित क्षेत्र और गले के नीचे-नीचे शरीर के सभी भागों में लगाया जाता है।

डॉ मधु सूदन व्यास

Benefits of basil “A Divine medicinal Plant”

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भारतीय संस्कृति में तुलसी के पौधे का बहुत महत्व है, और इस पौधे को बहुत पवित्र माना जाता है। ऎसा माना जाता है कि जिस घर में तुलसी का पौधा नहीं होता उस घर में भगवान भी रहना पसंद नहीं करते। माना जाता है कि घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगा कलह और दरिद्रता दूर करता है। इसे घर के आंगन में स्थापित कर सारा परिवार सुबह-सवेरे इसकी पूजा-अर्चना करता है। यह मन और तन दोनों को स्वच्छ करती है। इसके गुणों के कारण इसे पूजनीय मानकर उसे देवी का दर्जा दिया जाता है। तुलसी केवल हमारी आस्था का प्रतीक भर नहीं है। इस पौधे में पाए जाने वाले औषधीय गुणों के कारण आयुर्वेद में भी तुलसी को महत्वपूर्ण माना गया है। भारत में सदियों से तुलसी का इस्तेमाल होता चला आ रहा है।

  • लिवर (यकृत) संबंधी समस्या: तुलसी की 10-12 पत्तियों को गर्म पानी से धोकर रोज सुबह खाएं। लिवर की समस्याओं में यह बहुत फायदेमंद है।
  • पेटदर्द होना: एक चम्मच तुलसी की पिसी हुई पत्तियों को पानी के साथ मिलाकर गाढा पेस्ट बना लें। पेटदर्द होने पर इस लेप को नाभि और पेट के आस-पास लगाने से आराम मिलता है।
  • पाचन संबंधी समस्या : पाचन संबंधी समस्याओं जैसे दस्त लगना, पेट में गैस बनना आदि होने पर एक ग्लास पानी में 10-15 तुलसी की पत्तियां डालकर उबालें और काढा बना लें। इसमें चुटकी भर सेंधा नमक डालकर पीएं।
  •  बुखार आने पर : दो कप पानी में एक चम्मच तुलसी की पत्तियों का पाउडर और एक चम्मच इलायची पाउडर मिलाकर उबालें और काढा बना लें। दिन में दो से तीन बार यह काढा पीएं। स्वाद के लिए चाहें तो इसमें दूध और चीनी भी मिला सकते हैं।
  •  खांसी-जुकाम : करीब सभी कफ सीरप को बनाने में तुलसी का इस्तेमाल किया जाता है। तुलसी की पत्तियां कफ साफ करने में मदद करती हैं। तुलसी की कोमल पत्तियों को थोडी- थोडी देर पर अदरक के साथ चबाने से खांसी-जुकाम से राहत मिलती है। चाय की पत्तियों को उबालकर पीने से गले की खराश दूर हो जाती है। इस पानी को आप गरारा करने के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
  •  सर्दी से बचाव : बारिश या ठंड के मौसम में सर्दी से बचाव के लिए तुलसी की लगभग 10-12 पत्तियों को एक कप दूध में उबालकर पीएं। सर्दी की दवा के साथ-साथ यह एक न्यूट्रिटिव ड्रिंक के रूप में भी काम करता है। सर्दी जुकाम होने पर तुलसी की पत्तियों को चाय में उबालकर पीने से राहत मिलती है। तुलसी का अर्क तेज बुखार को कम करने में भी कारगर साबित होता है
  •  श्वास की समस्या : श्वास संबंधी समस्याओं का उपचार करने में तुलसी खासी उपयोगी साबित होती है। शहद, अदरक और तुलसी को मिलाकर बनाया गया काढ़ा पीने से ब्रोंकाइटिस, दमा, कफ और सर्दी में राहत मिलती है। नमक, लौंग और तुलसी के पत्तों से बनाया गया काढ़ा इंफ्लुएंजा (एक तरह का बुखार) में फौरन राहत देता है।
  • गुर्दे की पथरी : तुलसी गुर्दे को मजबूत बनाती है। यदि किसी के गुर्दे में पथरी हो गई हो तो उसे शहद में मिलाकर तुलसी के अर्क का नियमित सेवन करना चाहिए। छह महीने में फर्क दिखेगा।
  •  हृदय रोग : तुलसी खून में कोलेस्ट्राल के स्तर को घटाती है। ऐसे में हृदय रोगियों के लिए यह खासी कारगर साबित होती है।
  •  तनाव : तुलसी की पत्तियों में तनाव रोधीगुण भी पाए जाते हैं। तनाव को खुद से दूर रखने के लिए कोई भी व्यक्ति तुलसी के 12 पत्तों का रोज दो बार सेवन कर सकता है।
  • मुंह का संक्रमण : अल्सर और मुंह के अन्य संक्रमण में तुलसी की पत्तियां फायदेमंद साबित होती हैं। रोजाना तुलसी की कुछ पत्तियों को चबाने से मुंह का संक्रमण दूर हो जाता है।
  • त्वचा रोग : दाद, खुजली और त्वचा की अन्य समस्याओं में तुलसी के अर्क को प्रभावित जगह पर लगाने से कुछ ही दिनों में रोग दूर हो जाता है। तुलसी की ताजा पत्तियों को संक्रमित त्वचा पर रगडे। इससे इंफेक्शन ज्यादा नहीं फैल पाता। नैचुरोपैथों द्वारा ल्यूकोडर्मा का इलाज करने में तुलसी के पत्तों को सफलता पूर्वक इस्तेमाल किया गया है।
  • सांसों की दुर्गध : तुलसी की सूखी पत्तियों को सरसों के तेल में मिलाकर दांत साफ करने से सांसों की दुर्गध चली जाती है। पायरिया जैसी समस्या में भी यह खासा कारगर साबित होती है।
  • सिर का दर्द : सिर के दर्द में तुलसी एक बढि़या दवा के तौर पर काम करती है। तुलसी का काढ़ा पीने से सिर के दर्द में आराम मिलता है।
  • आंखों की समस्या : आंखों की जलन में तुलसी का अर्क बहुत कारगर साबित होता है। रात में रोजाना श्यामा तुलसी के अर्क को दो बूंद आंखों में डालना चाहिए।
  • कान में दर्द : तुलसी के पत्तों को सरसों के तेल में भून लें और लहसुन का रस मिलाकर कान में डाल लें। दर्द में आराम मिलेगा।
  •  ब्लड-प्रेशर को सामान्य रखने के लिए तुलसी के पत्तों का सेवन करना चाहिए।
  • वात रोग: तुलसी के पांच पत्ते और दो काली मिर्च मिलाकर खाने से वात रोग दूर हो जाता है।
  • कैंसर रोग में तुलसी के पत्ते चबाकर ऊपर से पानी पीने से काफी लाभ मिलता है।
  • बच्चो के रोग: तुलसी तथा पान के पत्तों का रस बराबर मात्रा में मिलाकर देने से बच्चों के पेट फूलने का रोग समाप्त हो जाता है।
  • विटामिन और मिनरल का भंडार: तुलसी का तेल विटामिन सी, कैल्शियम और फास्फोरस से भरपूर होता है।
  •  मक्खी- मच्छरों : को भी तुलसी का तेल दूर रखता है।
  • वायरल से बचाव: बदलते मौसम में चाय बनाते हुए हमेशा तुलसी की कुछ पत्तियां डाल दें। वायरल से बचाव रहेगा।
  • चक्कर: शहद में तुलसी की पत्तियों के रस को मिलाकर चाटने से चक्कर आना बंद हो जाता है।
  • पाईल्स  बवासीर : तुलसी के बीज का चूर्ण दही के साथ लेने से खूनी बवासीर में खून आना बंद हो जाता है।
  • पुरुषत्व: तुलसी के बीजों का चूर्ण दूध के साथ लेने से नपुंसकता दूर होती है और यौन-शक्ति में वृध्दि होती है।
  • रोज सुबह तुलसी की पत्तियों के रस को एक चम्मच शहद के साथ मिलाकर पीने से स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है।

तुलसी की केवल पत्तियां ही लाभकारी नहीं होती। तुलसी के पौधे पर लगने वाले फल जिन्हें आमतौर पर मंजर कहते हैं, पत्तियों की तुलना में कहीं अघिक फायदेमंद होता है। विभिन्न रोगों में दवा और काढे के रूप में तुलसी की पत्तियों की जगह मंजर का उपयोग भी किया जा सकता है। इससे कफ द्वारा पैदा होने वाले रोगों से बचाने वाला और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाला माना गया है।

किंतु जब भी तुलसी के पत्ते मुंह में रखें, उन्हें दांतों से न चबाकर सीधे ही निगल लें। इसके पीछे का विज्ञान यह है कि तुलसी के पत्तों में धातु के अंश होते हैं। जो चबाने पर बाहर निकलकर दांतों की सुरक्षा परत को नुकसान पहुंचाते हैं। जिससे दंत और मुख रोग होने का खतरा बढ़ जाता है।

तुलसी का पौधा मलेरिया के कीटाणु नष्ट करता है। नई खोज से पता चला है इसमें कीनोल, एस्कार्बिक एसिड, केरोटिन और एल्केलाइड होते हैं। तुलसी पत्र मिला हुआ पानी पीने से कई रोग दूर हो जाते हैं। इसीलिए चरणामृत में तुलसी का पत्ता डाला जाता है। तुलसी के स्पर्श से भी रोग दूर होते हैं। तुलसी पर किए गए प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि रक्तचाप और पाचनतंत्र के नियमन में तथा मानसिक रोगों में यह लाभकारी है। इससे रक्तकणों की वृद्धि होती है। तुलसी ब्रह्मचर्य की रक्षा करने एवं यह त्रिदोषनाशक है।

औषधि जो मौत के मुँह से खींच लाएं

मकरध्वज आयुर्वेद की महौषधि है इसके समान सर्व रोग नाशिनी कोई दवा संसार में किसी भी पैथी में नहीं है। बड़े बड़े डॉक्टर्स ने भी यह बात मान ली है कि मकरध्वज के बराबर दुनिया में कोई दूसरी दवा नहीं है। इसके द्वारा अनगिनत प्राणी काल के मुंह से बचते है। बंगाली डॉक्टर्स सबसे ज्यादा इसका ही व्यव्हार करते हैं।
एक ही मकरध्वज से बहुत सारे रोगों में आराम – यह कोई विज्ञापन नहीं है, युक्तिसंगत और हज़ारों डॉक्टर्स और लोगों का अनुभव है। मकर ध्वज के सेवन से मनुष्य कि ताक़त बहुत बढती है। यह हृदय और स्नायुमंडल (दिमाग) को इंजेक्शन कि तरह पांच मिनट में ताक़तवर बनाता है। मकरध्वज खाने से शरीर का वजन निश्चित रूप से बढ़ता है। यह बल वीर्य कान्ति शक्ति पुरुषार्थ आदि के लिए सर्व श्रेष्ठ है। शीघ्रपतन की तो ये अजूबा दवा है। नपुंसकता के लिए मकरध्वज महा गुणकारी है। गोद के बच्चे से लेकर 100 वर्ष तक के आदमी को मकर ध्वज एक सा फायदा करती है।
लोगों में ग़लतफ़हमी है कि मकर ध्वज या चंद्रोदय सिर्फ मरते समय ही दी जाती है जिस से व्यक्ति के प्राण बचने के चांस बन जाते हैं। यह तो सही है के सबसे अच्छी दवा होने के नाते यह मरते व्यक्ति को भी जिंदा कर देती है। अब जो दवा मरते व्यक्ति को जिंदा कर प्राण दान दे सकती है वो दवा साधारण दिखने वाले रोगों में तो जादू मन्त्र की तरह फायदा करती है। बंगाल में इसका बहुत प्रयोग होता है। वहां के धनी व्यक्ति बारहों महीनो बिना रोग के मकर ध्वज को खाते हैं और बहुत ही तंदुरुस्त बने रहते हैं।
भैषज्य रत्नावली में लिखा है
एतदभ्यासतश्चैव जरामरण नाश्नाम:
अनुपान विधानेन निहन्ति विविधान गदान

अर्थात – इसके सेवन से बुढापा चला जाता है और अचानक मौत (जैसे हार्ट फेल) नहीं होती। अनुपान भेद से मकरध्वज बहुत सी बिमारियों को दूर करता है।
मकरध्वज के लाभकारी अनुपान
1 मिर्गी में बच का चूर्ण और शहद।
1 नए बुखार में अदरक का रस या परवल का रस और शहद।
1 स्तंभक शक्ति के लिए माजूफल तथा जायफल का चूर्ण और शहद।
1 मियादी बुखार में पान का रस या शहद।
1 ताक़त बढ़ाने के लिए वेदाना का रस, मलाई मक्खन, अंगूर का रस, शतावर का रस या पान का रस और शहद।
1 सन्निपात इ ब्राह्म रस के साथ।
1 पित्त रोग में शहद, सौंफ और धनिये का पानी।
1 निमोनिया में अडूसे का रस और शहद।
1 कफ रोग में अदरक का रस और शहद।
1 मोतीझरा में शहद और लौंग का काढ़ा।
1 नाडी छूटने पर तुलसी का रस शहद।
1 मलेरिया बुखार में करंज का चूर्ण और शहद।
1 सूतिका रोग में शहद और दशमूल का काढ़ा।
1 पुराने बुखार में पीपल का चूर्ण या शेफाली का रस और शहद।
1 सफ़ेद प्रदर में चावल का धोवन (मांड) या राल का चूर्ण और शहद।
1 ज्वारातिसर में शहद और सौंठ का पानी।
1 रक्तप्रदर में अशोक की छाल का चूर्ण या उससे पकाया हुआ दूध और शहद।
1 आंव के दस्तों में बिल्व (बेल) कि गिरी का चूर्ण और शहद
1 मुख रोग में गिलोय का रस और शहद।
1 खून के दस्त में कुडे कि छाल का काढ़ा और शहद।
1 शीतला (चेचक) में करेले की पत्ती का रस और शहद।
1 पतले दस्त में जीरे का चूर्ण और शहद।
1 गर्मी में अनंतमूल का काढ़ा और शहद।
1 पुराने दस्त में चावल का धोवन और शहद।
1 उदर रोग और शौथ में शहद और शुद्ध रेंडी का तेल।
1 संग्रहणी में जीरा का चूर्ण और शहद।
1 दुर्बलता में असगंध का चूर्ण और शहद।
1 बवासीर में जिमीकंद का चूर्ण या निमोली का चूर्ण और शहद।
1 मधुमेह में जामुन की गुठली का चूर्ण और शहद।
1 खूनी बवासीर में नागकेशर का चूर्ण और शहद।
1 प्रमेह (धातु स्त्राव) में कच्ची हल्दी का रस या आंवले का रस अथवा नीम गिलोय का रस और शहद।
1 हैजे में प्याज का रस और शहद।
1 पथरी में कुल्थी की दाल का काढ़ा और शहद।
1 कब्जियत में त्रिफला का पानी और शहद।
1 सुजाक में जवाखार और गर्म पानी।
1 अमल्पित्त में आंवले का पानी और शहद।
1 मूत्रकच्छ और मुत्रघात में गोखरू का काढ़ा और शहद।
1 पांडू (पीलिया) में पुराने गुड के साथ।
1 हृदय रोग में अर्जुन की छाल का चूर्ण और शहद।
1 राजयक्ष्मा में सितोपलादि चूर्ण, गिलोय का सत्व अथवा बासक (अडूसे) का रस और शहद।
1 आमवात में शहद से खाकर ऊपर से सने, बड़ी हरड और अमलतास का काढ़ा लें।
1 वयुगोले में भुनी हुई हींग का चूर्ण और गर्म पानी।
1 खांसी में कंटकारी का रस या पान का रस और शहद।
1 दमे में बेल के पत्तों का रस या अपामार्ग का रस और शहद।
1 वातरक्त में गिलोय का रस और शहद।
1 स्वरभंग में मुलेठी चूर्ण और शहद।
1 वातव्याधि में अरंड की जड़ का रस और शहद।
1 अरुचि में निम्बू का रस और शहद।
1 पागलपन में कुष्मांडाव्लेह या ब्राहम रस और शहद।
विशेष
इतनी गुणकारी होने की वजह से ये थोड़ी महंगी होती है, और लोग इसमें मिलावट भी कर देते हैं, इसलिए जब भी मकर ध्वज खरीदना हो तो बैद्यनाथ कंपनी की ही लीजिये, बैद्यनाथ कई दशकों से क्वालिटी और सही दाम में ये सब चीजें मुहैया करवाता है। बैद्यनाथ की मकर ध्वज एक ही खुराक में अपना असर दिखा देती है। रोगों में इसके सही उपयोग की विधि आप वैद के परामर्श से ही करें। और बिना रोग के अगर आप इसको लेना चाहें तो भी आप इसको नियमित सेवन कर सकते हैं।
मकरध्वज की सेवन की मात्रा
मकरध्वज आधी रत्ती से एक रत्ती (62 से 125 मि। ग्रा।) तक आवश्यकतानुसार दें।
सिद्ध मकरध्वज
राजा महाराजा और धनी व्यक्ति ही इसका व्यव्हार करते हैं। मकर ध्वज के सम्पूर्ण गुण इसमें पाए जाते हैं। यह मकरध्वज से अधिक शक्तिशाली होती है।
सिद्ध मकरध्वज स्पेशल
सिद्ध मकरध्वज स्पेशल अष्ट दश संस्कारित एवम षडगुण बलिजारित पारद से निर्मित मकर ध्वज, स्वर्ण भस्म, कस्तूरी और मोती ……

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